बग लाइफ साइकिल (Bug Life Cycle) वह यात्रा है जो एक दोष (Defect) मिलने से लेकर उसके पूरी तरह बंद (Closed) होने तक तय करता है। इसकी शुरुआत 'न्यू' (New) स्थिति से होती है, जब एक टेस्टर (Tester) पहली बार किसी समस्या को खोजता है और उसे सिस्टम (System) में दर्ज करता है। इस चरण में बग (Bug) के बारे में पूरी जानकारी, स्क्रीनशॉट (Screenshots) और उसे दोहराने के चरण (Steps to Reproduce) लिखे जाते हैं।
अगले चरण में प्रोजेक्ट मैनेजर या लीड इसे 'ओपन' (Open) या 'असाइन' (Assigned) स्थिति में बदल देता है। यहाँ यह तय किया जाता है कि कौन सा डेवलपर (Developer) इस समस्या को ठीक करेगा। डेवलपर इस बग (Bug) का विश्लेषण करता है और यह देखता है कि क्या यह वास्तव में एक त्रुटि है। यदि वह इसे स्वीकार करता है, तो वह कोड (Code) में सुधार करना शुरू कर देता है ताकि समस्या को जड़ से खत्म किया जा सके।
सुधार होने के बाद, बग (Bug) की स्थिति 'फिक्स्ड' (Fixed) हो जाती है। इसके बाद यह वापस टेस्टर (Tester) के पास 'री-टेस्टिंग' (Re-testing) के लिए आता है। टेस्टर फिर से उन्हीं परिस्थितियों में सॉफ्टवेयर की जांच करता है। यदि समस्या दूर हो गई है, तो वह उसे 'वेरिफाइड' (Verified) कर देता है। यदि समस्या अभी भी बनी हुई है, तो उसे 'री-ओपन' (Re-opened) कर दिया जाता है और चक्र फिर से शुरू होता है।
कभी-कभी कुछ बग्स (Bugs) को 'डेफर्ड' (Deferred) स्थिति में डाल दिया जाता है। इसका मतलब है कि समस्या तो है, लेकिन इसे अभी ठीक करने के बजाय भविष्य के रिलीज (Future Release) में देखा जाएगा। इसके अलावा, यदि कोई बग दोबारा रिपोर्ट होता है, तो उसे 'डुप्लीकेट' (Duplicate) या यदि वह वास्तव में बग नहीं है, तो उसे 'रिजेक्टेड' (Rejected) के रूप में मार्क (Mark) किया जा सकता है।
अंत में, जब बग (Bug) पूरी तरह से ठीक हो जाता है और परीक्षण (Testing) में पास हो जाता है, तो उसे 'क्लोज्ड' (Closed) कर दिया जाता है। यह अंतिम चरण है जो दर्शाता है कि अब वह विशेष समस्या सॉफ्टवेयर (Software) में मौजूद नहीं है। इस पूरी प्रक्रिया का पालन करने से टीम के बीच पारदर्शिता बनी रहती है और सॉफ्टवेयर विकास (Software Development) सुव्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ता है।