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5जी (5G) तकनीक के आने के साथ ही रेडिएशन (Radiation) और स्वास्थ्य (Health) को लेकर कई तरह की चिंताएं और चर्चाएं शुरू हो गई हैं। वैज्ञानिक रूप से, 5जी (5G) सिग्नल 'नॉन-आयोनाइजिंग रेडिएशन' (Non-ionizing Radiation) की श्रेणी में आते हैं, जिसका अर्थ है कि इनमें मानव कोशिकाओं (Cells) के डीएनए (DNA) को नुकसान पहुँचाने के लिए पर्याप्त ऊर्जा नहीं होती। यह वही श्रेणी है जिसमें हमारे रेडियो (Radio), टीवी (TV) और वाई-फाई (Wi-Fi) सिग्नल आते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization - WHO) और इंटरनेशनल कमीशन ऑन नॉन-आयोनाइजिंग रेडिएशन प्रोटेक्शन (ICNIRP) जैसी संस्थाओं ने 5जी (5G) के लिए सख्त सुरक्षा मानक (Safety Standards) निर्धारित किए हैं। भारत में टेलीकॉम विभाग (Department of Telecommunications - DoT) इन मानकों की निगरानी करता है और मोबाइल टावरों (Mobile Towers) से निकलने वाली रेडियो फ्रीक्वेंसी (Radio Frequency) की जांच नियमित रूप से की जाती है। अभी तक किसी भी प्रामाणिक शोध (Research) में 5जी (5G) को इंसानों के लिए घातक नहीं पाया गया है।

पर्यावरण और पक्षियों (Birds) पर इसके प्रभाव को लेकर भी कई सवाल उठाए जाते हैं। हालांकि कुछ प्रारंभिक अध्ययनों में उच्च फ्रीक्वेंसी (High Frequency) के प्रति संवेदनशीलता की बात कही गई है, लेकिन बड़े पैमाने पर कोई ऐसा सबूत नहीं मिला है जो यह साबित करे कि 5जी (5G) से पक्षियों की प्रजातियों को खतरा है। दूरसंचार कंपनियां (Telecom Companies) छोटे सेल (Small Cells) का उपयोग करती हैं जो कम शक्ति (Low Power) पर काम करते हैं, जिससे रेडिएशन का स्तर नियंत्रित रहता है।

एक सामान्य डर एमएम-वेव (mmWave) फ्रीक्वेंसी को लेकर है क्योंकि इसकी आवृत्ति (Frequency) बहुत अधिक होती है। लेकिन सच यह है कि ये उच्च फ्रीक्वेंसी तरंगें मानव त्वचा (Human Skin) के भीतर गहराई तक प्रवेश नहीं कर सकतीं। वे केवल शरीर की सतह से टकराकर वापस लौट जाती हैं या अवशोषित (Absorb) हो जाती हैं। इसलिए, अंगों को नुकसान पहुँचाने की संभावना बहुत कम होती है। सुरक्षा के लिहाज से यह तकनीक पिछले नेटवर्क (Network) की तरह ही सुरक्षित मानी जा रही है।

तकनीकी प्रगति के साथ सुरक्षा उपायों (Safety Measures) को भी उन्नत किया जा रहा है। मोबाइल फोन का एसएआर वैल्यू (SAR Value) यह सुनिश्चित करता है कि उपकरण से निकलने वाला रेडिएशन सुरक्षित सीमा के भीतर हो। उपयोगकर्ताओं को सलाह दी जाती है कि वे प्रमाणित (Certified) फोन का उपयोग करें और सोते समय फोन को शरीर से दूर रखें। जागरूकता और वैज्ञानिक तथ्यों (Scientific Facts) पर भरोसा करना किसी भी डर को दूर करने का सबसे अच्छा तरीका है।

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5जी (5G) तकनीक के आने के साथ ही रेडिएशन (Radiation) और स्वास्थ्य (Health) को लेकर कई तरह की चिंताएं और चर्चाएं शुरू हो गई हैं। वैज्ञानिक रूप से, 5जी (5G) सिग्नल 'नॉन-आयोनाइजिंग रेडिएशन' (Non-ionizing Radiation) की श्रेणी में आते हैं, जिसका अर्थ है कि इनमें मानव कोशिकाओं (Cells) के डीएनए (DNA) को नुकसान पहुँचाने के लिए पर्याप्त ऊर्जा नहीं होती। यह वही श्रेणी है जिसमें हमारे रेडियो (Radio), टीवी (TV) और वाई-फाई (Wi-Fi) सिग्नल आते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization - WHO) और इंटरनेशनल कमीशन ऑन नॉन-आयोनाइजिंग रेडिएशन प्रोटेक्शन (ICNIRP) जैसी संस्थाओं ने 5जी (5G) के लिए सख्त सुरक्षा मानक (Safety Standards) निर्धारित किए हैं। भारत में टेलीकॉम विभाग (Department of Telecommunications - DoT) इन मानकों की निगरानी करता है और मोबाइल टावरों (Mobile Towers) से निकलने वाली रेडियो फ्रीक्वेंसी (Radio Frequency) की जांच नियमित रूप से की जाती है। अभी तक किसी भी प्रामाणिक शोध (Research) में 5जी (5G) को इंसानों के लिए घातक नहीं पाया गया है।

पर्यावरण और पक्षियों (Birds) पर इसके प्रभाव को लेकर भी कई सवाल उठाए जाते हैं। हालांकि कुछ प्रारंभिक अध्ययनों में उच्च फ्रीक्वेंसी (High Frequency) के प्रति संवेदनशीलता की बात कही गई है, लेकिन बड़े पैमाने पर कोई ऐसा सबूत नहीं मिला है जो यह साबित करे कि 5जी (5G) से पक्षियों की प्रजातियों को खतरा है। दूरसंचार कंपनियां (Telecom Companies) छोटे सेल (Small Cells) का उपयोग करती हैं जो कम शक्ति (Low Power) पर काम करते हैं, जिससे रेडिएशन का स्तर नियंत्रित रहता है।

एक सामान्य डर एमएम-वेव (mmWave) फ्रीक्वेंसी को लेकर है क्योंकि इसकी आवृत्ति (Frequency) बहुत अधिक होती है। लेकिन सच यह है कि ये उच्च फ्रीक्वेंसी तरंगें मानव त्वचा (Human Skin) के भीतर गहराई तक प्रवेश नहीं कर सकतीं। वे केवल शरीर की सतह से टकराकर वापस लौट जाती हैं या अवशोषित (Absorb) हो जाती हैं। इसलिए, अंगों को नुकसान पहुँचाने की संभावना बहुत कम होती है। सुरक्षा के लिहाज से यह तकनीक पिछले नेटवर्क (Network) की तरह ही सुरक्षित मानी जा रही है।

तकनीकी प्रगति के साथ सुरक्षा उपायों (Safety Measures) को भी उन्नत किया जा रहा है। मोबाइल फोन का एसएआर वैल्यू (SAR Value) यह सुनिश्चित करता है कि उपकरण से निकलने वाला रेडिएशन सुरक्षित सीमा के भीतर हो। उपयोगकर्ताओं को सलाह दी जाती है कि वे प्रमाणित (Certified) फोन का उपयोग करें और सोते समय फोन को शरीर से दूर रखें। जागरूकता और वैज्ञानिक तथ्यों (Scientific Facts) पर भरोसा करना किसी भी डर को दूर करने का सबसे अच्छा तरीका है।
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