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लोहड़ी की शाम को पवित्र अलाव (Bonfire) प्रज्वलित करना इस त्यौहार की सबसे मुख्य रस्म (Main Ritual) मानी जाती है, जिसे सूर्यास्त के ठीक बाद संपन्न किया जाता है। परिवार के सदस्य मिलकर सूखी लकड़ियों (Dry Wood) और गाय के गोबर के उपलों (Cow Dung Cakes) का एक पिरामिड जैसा ढांचा तैयार करते हैं। इस ढांचे को उत्तर-पश्चिम दिशा (North-West Direction) में बनाना शुभ माना जाता है, जहाँ सभी लोग पारंपरिक पोशाक (Traditional Attire) पहनकर एकत्र होते हैं। अग्नि प्रज्वलित करने के बाद सबसे पहले जल अर्पित किया जाता है ताकि स्थान की शुद्धि (Purification) हो सके।

अग्नि देव (Fire God) को सूर्य का प्रतिनिधि मानकर उनकी पूजा की जाती है, जो कड़ाके की ठंड (Extreme Winter) के अंत और लंबे दिनों के आगमन का प्रतीक है। लोग अपने हाथों में तिल, गुड़, मूंगफली और फुल्ले (Sesame, Jaggery, Peanuts and Popcorn) लेकर अग्नि की परिक्रमा (Circumambulation) करते हैं। "अदर आए दलिदर जाए" (May prosperity come and poverty leave) का नारा लगाते हुए इन सामग्रियों को अग्नि में अर्पित किया जाता है। यह रस्म व्यक्ति के भीतर की बुराइयों और आलस को जलाकर नई ऊर्जा (New Energy) भरने के लिए की जाती है।

सामूहिक रूप से अलाव (Bonfire) के चारों ओर घूमना सामाजिक एकता (Social Unity) और भाईचारे का संदेश देता है, जहाँ ऊंच-नीच का कोई भेदभाव नहीं होता। अलाव की लपटों को ऊँचा उठता देख लोग आने वाले साल में अपनी प्रगति (Progress) की कल्पना करते हैं। बच्चे अलाव के पास बैठकर दुल्ला भट्टी (Dulla Bhatti) की कहानियाँ सुनते हैं, जिससे उन्हें अपनी वीरतापूर्ण विरासत (Heroic Heritage) का ज्ञान होता है। यह रस्म पूरी रात चलती है, जहाँ अग्नि की गर्माहट रिश्तों के बीच के मनमुटाव को खत्म करने का काम करती है।

धार्मिक दृष्टि से अग्नि को देवताओं का मुख (Mouth of Gods) माना जाता है, इसलिए इसमें दी गई आहुति सीधे ईश्वर तक पहुँचती है। लोग अग्नि देव से अपने परिवार के स्वास्थ्य (Health) और दीर्घायु होने का आशीर्वाद मांगते हैं। परिक्रमा पूरी होने के बाद अग्नि की राख (Holy Ash) को माथे पर लगाना एक रक्षा कवच (Protection Shield) के रूप में देखा जाता है। यह अनुष्ठान (Ritual) न केवल धार्मिक है, बल्कि यह प्रकृति के प्रति हमारी कृतज्ञता (Gratitude) प्रकट करने का एक वैज्ञानिक तरीका भी है।

आज के समय में शहरों में सामूहिक सोसायटियों में एक ही बड़ा अलाव (Common Bonfire) जलाया जाता है ताकि पर्यावरण (Environment) का भी ध्यान रखा जा सके। अलाव के पास ढोल (Dhol) बजाना और भांगड़ा करना इस रस्म के उत्साह को और बढ़ा देता है। जब तक अग्नि प्रज्वलित रहती है, तब तक उत्सव का माहौल बना रहता है और लोग मूंगफली व रेवड़ी (Peanuts and Rewri) का आनंद लेते हैं। लोहड़ी की यह अग्नि अंधकार पर प्रकाश की विजय और नई आशाओं (New Hopes) का संचार करने वाली एक अत्यंत पवित्र रस्म है।

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लोहड़ी की शाम को पवित्र अलाव (Bonfire) प्रज्वलित करना इस त्यौहार की सबसे मुख्य रस्म (Main Ritual) मानी जाती है, जिसे सूर्यास्त के ठीक बाद संपन्न किया जाता है। परिवार के सदस्य मिलकर सूखी लकड़ियों (Dry Wood) और गाय के गोबर के उपलों (Cow Dung Cakes) का एक पिरामिड जैसा ढांचा तैयार करते हैं। इस ढांचे को उत्तर-पश्चिम दिशा (North-West Direction) में बनाना शुभ माना जाता है, जहाँ सभी लोग पारंपरिक पोशाक (Traditional Attire) पहनकर एकत्र होते हैं। अग्नि प्रज्वलित करने के बाद सबसे पहले जल अर्पित किया जाता है ताकि स्थान की शुद्धि (Purification) हो सके।

अग्नि देव (Fire God) को सूर्य का प्रतिनिधि मानकर उनकी पूजा की जाती है, जो कड़ाके की ठंड (Extreme Winter) के अंत और लंबे दिनों के आगमन का प्रतीक है। लोग अपने हाथों में तिल, गुड़, मूंगफली और फुल्ले (Sesame, Jaggery, Peanuts and Popcorn) लेकर अग्नि की परिक्रमा (Circumambulation) करते हैं। "अदर आए दलिदर जाए" (May prosperity come and poverty leave) का नारा लगाते हुए इन सामग्रियों को अग्नि में अर्पित किया जाता है। यह रस्म व्यक्ति के भीतर की बुराइयों और आलस को जलाकर नई ऊर्जा (New Energy) भरने के लिए की जाती है।

सामूहिक रूप से अलाव (Bonfire) के चारों ओर घूमना सामाजिक एकता (Social Unity) और भाईचारे का संदेश देता है, जहाँ ऊंच-नीच का कोई भेदभाव नहीं होता। अलाव की लपटों को ऊँचा उठता देख लोग आने वाले साल में अपनी प्रगति (Progress) की कल्पना करते हैं। बच्चे अलाव के पास बैठकर दुल्ला भट्टी (Dulla Bhatti) की कहानियाँ सुनते हैं, जिससे उन्हें अपनी वीरतापूर्ण विरासत (Heroic Heritage) का ज्ञान होता है। यह रस्म पूरी रात चलती है, जहाँ अग्नि की गर्माहट रिश्तों के बीच के मनमुटाव को खत्म करने का काम करती है।

धार्मिक दृष्टि से अग्नि को देवताओं का मुख (Mouth of Gods) माना जाता है, इसलिए इसमें दी गई आहुति सीधे ईश्वर तक पहुँचती है। लोग अग्नि देव से अपने परिवार के स्वास्थ्य (Health) और दीर्घायु होने का आशीर्वाद मांगते हैं। परिक्रमा पूरी होने के बाद अग्नि की राख (Holy Ash) को माथे पर लगाना एक रक्षा कवच (Protection Shield) के रूप में देखा जाता है। यह अनुष्ठान (Ritual) न केवल धार्मिक है, बल्कि यह प्रकृति के प्रति हमारी कृतज्ञता (Gratitude) प्रकट करने का एक वैज्ञानिक तरीका भी है।

आज के समय में शहरों में सामूहिक सोसायटियों में एक ही बड़ा अलाव (Common Bonfire) जलाया जाता है ताकि पर्यावरण (Environment) का भी ध्यान रखा जा सके। अलाव के पास ढोल (Dhol) बजाना और भांगड़ा करना इस रस्म के उत्साह को और बढ़ा देता है। जब तक अग्नि प्रज्वलित रहती है, तब तक उत्सव का माहौल बना रहता है और लोग मूंगफली व रेवड़ी (Peanuts and Rewri) का आनंद लेते हैं। लोहड़ी की यह अग्नि अंधकार पर प्रकाश की विजय और नई आशाओं (New Hopes) का संचार करने वाली एक अत्यंत पवित्र रस्म है।
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