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अरावली रेंज (Aravali Range) एक प्राकृतिक अवरोधक (Natural Blockade) की तरह कार्य करती है जो पश्चिमी राजस्थान के रेतीले थार मरुस्थल को उपजाऊ गंगा-यमुना के मैदानों की ओर बढ़ने से रोकती है। यह पहाड़ियाँ उत्तर-पूर्व की ओर चलने वाली रेतीली हवाओं (Sandy Winds) की गति को कम कर देती हैं, जिससे धूल के कण वहीं रुक जाते हैं। यदि अरावली का अस्तित्व समाप्त हो जाए, तो हरियाणा, पंजाब और दिल्ली के कृषि क्षेत्र (Agricultural Fields) भी धीरे-धीरे बंजर भूमि में बदल सकते हैं। मरुस्थलीकरण (Desertification) को रोकने में इन पहाड़ियों की भौतिक स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है।

पहाड़ियों पर स्थित वनस्पति और घने जंगल (Dense Forests) मिट्टी के कटाव को रोकने और नमी को सोखने का कार्य करते हैं। पेड़ों की जड़ें मिट्टी को मजबूती से पकड़े रहती हैं, जिससे हवा के साथ उपजाऊ परत (Topsoil) का उड़ना कम हो जाता है। अरावली क्षेत्र में होने वाला वनरोपण (Afforestation) एक हरित पट्टी (Green Belt) का निर्माण करता है जो पारिस्थितिक स्थिरता प्रदान करती है। यह प्राकृतिक प्रक्रिया मरुस्थल की सीमाओं को स्थिर रखने और क्षेत्रीय जलवायु (Regional Climate) को संतुलित करने में सहायक होती है।

जल विज्ञान की दृष्टि से अरावली रेंज (Aravali Range) वर्षा जल के संचयन और भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) के लिए एक विशाल स्पंज की तरह काम करती है। पहाड़ियों की ढलानें पानी के वेग को कम करती हैं, जिससे जल सीधे बहने के बजाय भूमि के भीतर रिस जाता है। यह प्रक्रिया आसपास के क्षेत्रों के कुओं और जलाशयों (Reservoirs) के जल स्तर को बढ़ाती है, जिससे शुष्क क्षेत्रों में भी खेती संभव हो पाती है। जल सुरक्षा (Water Security) और मरुस्थल नियंत्रण के बीच अरावली एक महत्वपूर्ण कड़ी है।

शहरीकरण और अवैध खनन (Illegal Mining) ने अरावली की इस प्राकृतिक ढाल में कई दरारें पैदा कर दी हैं, जिन्हें 'गैप्स' (Gaps) कहा जाता है। इन रिक्त स्थानों के माध्यम से मरुस्थल की रेत अब दिल्ली और गुरुग्राम की ओर तेजी से बढ़ रही है। पर्यावरणविदों के अनुसार, इन पहाड़ियों की ऊँचाई कम होना वायु गुणवत्ता (Air Quality) में गिरावट का एक प्रमुख कारण है। धूल भरी आंधियों का शहरी क्षेत्रों तक पहुँचना सीधे तौर पर अरावली के क्षरण (Degradation of Aravali) से जुड़ा हुआ है।

मरुस्थलीकरण (Desertification) के इस खतरे से निपटने के लिए भारत सरकार ने अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट (Aravali Green Wall Project) जैसी योजनाएं शुरू की हैं। इसका लक्ष्य पहाड़ियों के किनारे एक विशाल वन क्षेत्र विकसित करना है जो रेत के तूफानों के लिए एक स्थायी फिल्टर (Permanent Filter) बन सके। अरावली का संरक्षण न केवल राजस्थान के लिए, बल्कि पूरे उत्तर भारत की खाद्य सुरक्षा (Food Security) के लिए अनिवार्य है। इन पहाड़ियों की मजबूती ही हमारे मैदानी इलाकों की हरियाली को सुरक्षित रख सकती है।

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अरावली रेंज (Aravali Range) एक प्राकृतिक अवरोधक (Natural Blockade) की तरह कार्य करती है जो पश्चिमी राजस्थान के रेतीले थार मरुस्थल को उपजाऊ गंगा-यमुना के मैदानों की ओर बढ़ने से रोकती है। यह पहाड़ियाँ उत्तर-पूर्व की ओर चलने वाली रेतीली हवाओं (Sandy Winds) की गति को कम कर देती हैं, जिससे धूल के कण वहीं रुक जाते हैं। यदि अरावली का अस्तित्व समाप्त हो जाए, तो हरियाणा, पंजाब और दिल्ली के कृषि क्षेत्र (Agricultural Fields) भी धीरे-धीरे बंजर भूमि में बदल सकते हैं। मरुस्थलीकरण (Desertification) को रोकने में इन पहाड़ियों की भौतिक स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है।

पहाड़ियों पर स्थित वनस्पति और घने जंगल (Dense Forests) मिट्टी के कटाव को रोकने और नमी को सोखने का कार्य करते हैं। पेड़ों की जड़ें मिट्टी को मजबूती से पकड़े रहती हैं, जिससे हवा के साथ उपजाऊ परत (Topsoil) का उड़ना कम हो जाता है। अरावली क्षेत्र में होने वाला वनरोपण (Afforestation) एक हरित पट्टी (Green Belt) का निर्माण करता है जो पारिस्थितिक स्थिरता प्रदान करती है। यह प्राकृतिक प्रक्रिया मरुस्थल की सीमाओं को स्थिर रखने और क्षेत्रीय जलवायु (Regional Climate) को संतुलित करने में सहायक होती है।

जल विज्ञान की दृष्टि से अरावली रेंज (Aravali Range) वर्षा जल के संचयन और भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) के लिए एक विशाल स्पंज की तरह काम करती है। पहाड़ियों की ढलानें पानी के वेग को कम करती हैं, जिससे जल सीधे बहने के बजाय भूमि के भीतर रिस जाता है। यह प्रक्रिया आसपास के क्षेत्रों के कुओं और जलाशयों (Reservoirs) के जल स्तर को बढ़ाती है, जिससे शुष्क क्षेत्रों में भी खेती संभव हो पाती है। जल सुरक्षा (Water Security) और मरुस्थल नियंत्रण के बीच अरावली एक महत्वपूर्ण कड़ी है।

शहरीकरण और अवैध खनन (Illegal Mining) ने अरावली की इस प्राकृतिक ढाल में कई दरारें पैदा कर दी हैं, जिन्हें 'गैप्स' (Gaps) कहा जाता है। इन रिक्त स्थानों के माध्यम से मरुस्थल की रेत अब दिल्ली और गुरुग्राम की ओर तेजी से बढ़ रही है। पर्यावरणविदों के अनुसार, इन पहाड़ियों की ऊँचाई कम होना वायु गुणवत्ता (Air Quality) में गिरावट का एक प्रमुख कारण है। धूल भरी आंधियों का शहरी क्षेत्रों तक पहुँचना सीधे तौर पर अरावली के क्षरण (Degradation of Aravali) से जुड़ा हुआ है।

मरुस्थलीकरण (Desertification) के इस खतरे से निपटने के लिए भारत सरकार ने अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट (Aravali Green Wall Project) जैसी योजनाएं शुरू की हैं। इसका लक्ष्य पहाड़ियों के किनारे एक विशाल वन क्षेत्र विकसित करना है जो रेत के तूफानों के लिए एक स्थायी फिल्टर (Permanent Filter) बन सके। अरावली का संरक्षण न केवल राजस्थान के लिए, बल्कि पूरे उत्तर भारत की खाद्य सुरक्षा (Food Security) के लिए अनिवार्य है। इन पहाड़ियों की मजबूती ही हमारे मैदानी इलाकों की हरियाली को सुरक्षित रख सकती है।
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