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अरावली पर्वतमाला (Aravali Mountain Range) और भारतीय मानसून (Indian Monsoon) के बीच एक बहुत ही जटिल और महत्वपूर्ण संबंध है। अरावली की दिशा दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर है, जो कि दक्षिण-पश्चिम मानसूनी हवाओं (Monsoon Winds) के बिल्कुल समानांतर (Parallel) पड़ती है। इस समानांतर स्थिति के कारण मानसूनी हवाएँ पहाड़ों से टकराकर ऊपर नहीं उठ पातीं और बिना वर्षा किए सीधे निकल जाती हैं। यही भौगोलिक कारण है कि पश्चिमी राजस्थान (Western Rajasthan) एक वर्षा छाया क्षेत्र (Rain Shadow Area) बन जाता है और वहाँ कम बारिश होती है।

इसके विपरीत, अरावली की पूर्वी ढलानों (Eastern Slopes) पर स्थिति थोड़ी अलग होती है जहाँ हवाओं के रुख में मामूली बदलाव भी अच्छी वर्षा (Heavy Rain) का कारण बन सकता है। पहाड़ियों की ऊँचाई मानसूनी बादलों को रोकने में पूरी तरह सक्षम नहीं है, फिर भी यह बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal) से आने वाली नम हवाओं के लिए एक मंद अवरोध पैदा करती है। उदयपुर और चित्तौड़गढ़ जैसे जिलों में होने वाली वर्षा का श्रेय अरावली के इसी विन्यास (Configuration) को जाता है। यह जल विज्ञान (Hydrology) की दृष्टि से पूरे राज्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

मानसून के दौरान अरावली की पहाड़ियाँ जल संचयन (Water Harvesting) के प्राकृतिक माध्यम के रूप में कार्य करती हैं। पहाड़ियों पर होने वाली बारिश का पानी नालों और झरनों के माध्यम से नीचे आता है और नदियों के जल स्तर (River Water Level) को बढ़ाता है। बनास और साबरमती जैसी प्रमुख नदियों का उद्गम और प्रवाह इन्ही मानसूनी गतिविधियों पर निर्भर है। पहाड़ियों के वन आवरण (Forest Cover) के कारण पानी का बहाव धीमा होता है जिससे वह ज़मीन के अंदर रिसकर भूजल (Groundwater) को रिचार्ज करता है।

वर्षा ऋतु में अरावली का स्वरूप पूरी तरह बदल जाता है और यह एक 'ग्रीन बैरियर' (Green Barrier) की तरह दिखने लगता है। यह हरियाली बादलों को आकर्षित करने और स्थानीय स्तर पर आर्द्रता (Humidity) बढ़ाने में सहायक होती है। जलवायु वैज्ञानिकों (Climate Scientists) का मानना है कि अरावली की सघनता का सीधा संबंध वर्षा की मात्रा से है। जिन क्षेत्रों में पहाड़ नग्न और सूखे हैं, वहाँ बादलों का ठहराव कम होता है। इसलिए, मानसून का अधिकतम लाभ उठाने के लिए पहाड़ियों पर वृक्षारोपण (Plantation) बहुत जरूरी है।

हाल के वर्षों में मानसून के पैटर्न में आए बदलाव और अरावली के कटाव ने वर्षा की अनिश्चितता (Rainfall Uncertainty) बढ़ा दी है। कभी अचानक होने वाली तेज बारिश से बाढ़ आ जाती है, तो कभी लंबे समय तक सूखा (Drought) बना रहता है। पहाड़ियों के गायब होने से मानसूनी हवाओं का मार्ग भी प्रभावित हो रहा है जो एक खतरनाक संकेत है। अरावली और मानसून का यह संतुलन ही राजस्थान की कृषि और अर्थव्यवस्था (Economy) का आधार है, जिसे बचाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।

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अरावली पर्वतमाला (Aravali Mountain Range) और भारतीय मानसून (Indian Monsoon) के बीच एक बहुत ही जटिल और महत्वपूर्ण संबंध है। अरावली की दिशा दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर है, जो कि दक्षिण-पश्चिम मानसूनी हवाओं (Monsoon Winds) के बिल्कुल समानांतर (Parallel) पड़ती है। इस समानांतर स्थिति के कारण मानसूनी हवाएँ पहाड़ों से टकराकर ऊपर नहीं उठ पातीं और बिना वर्षा किए सीधे निकल जाती हैं। यही भौगोलिक कारण है कि पश्चिमी राजस्थान (Western Rajasthan) एक वर्षा छाया क्षेत्र (Rain Shadow Area) बन जाता है और वहाँ कम बारिश होती है।

इसके विपरीत, अरावली की पूर्वी ढलानों (Eastern Slopes) पर स्थिति थोड़ी अलग होती है जहाँ हवाओं के रुख में मामूली बदलाव भी अच्छी वर्षा (Heavy Rain) का कारण बन सकता है। पहाड़ियों की ऊँचाई मानसूनी बादलों को रोकने में पूरी तरह सक्षम नहीं है, फिर भी यह बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal) से आने वाली नम हवाओं के लिए एक मंद अवरोध पैदा करती है। उदयपुर और चित्तौड़गढ़ जैसे जिलों में होने वाली वर्षा का श्रेय अरावली के इसी विन्यास (Configuration) को जाता है। यह जल विज्ञान (Hydrology) की दृष्टि से पूरे राज्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

मानसून के दौरान अरावली की पहाड़ियाँ जल संचयन (Water Harvesting) के प्राकृतिक माध्यम के रूप में कार्य करती हैं। पहाड़ियों पर होने वाली बारिश का पानी नालों और झरनों के माध्यम से नीचे आता है और नदियों के जल स्तर (River Water Level) को बढ़ाता है। बनास और साबरमती जैसी प्रमुख नदियों का उद्गम और प्रवाह इन्ही मानसूनी गतिविधियों पर निर्भर है। पहाड़ियों के वन आवरण (Forest Cover) के कारण पानी का बहाव धीमा होता है जिससे वह ज़मीन के अंदर रिसकर भूजल (Groundwater) को रिचार्ज करता है।

वर्षा ऋतु में अरावली का स्वरूप पूरी तरह बदल जाता है और यह एक 'ग्रीन बैरियर' (Green Barrier) की तरह दिखने लगता है। यह हरियाली बादलों को आकर्षित करने और स्थानीय स्तर पर आर्द्रता (Humidity) बढ़ाने में सहायक होती है। जलवायु वैज्ञानिकों (Climate Scientists) का मानना है कि अरावली की सघनता का सीधा संबंध वर्षा की मात्रा से है। जिन क्षेत्रों में पहाड़ नग्न और सूखे हैं, वहाँ बादलों का ठहराव कम होता है। इसलिए, मानसून का अधिकतम लाभ उठाने के लिए पहाड़ियों पर वृक्षारोपण (Plantation) बहुत जरूरी है।

हाल के वर्षों में मानसून के पैटर्न में आए बदलाव और अरावली के कटाव ने वर्षा की अनिश्चितता (Rainfall Uncertainty) बढ़ा दी है। कभी अचानक होने वाली तेज बारिश से बाढ़ आ जाती है, तो कभी लंबे समय तक सूखा (Drought) बना रहता है। पहाड़ियों के गायब होने से मानसूनी हवाओं का मार्ग भी प्रभावित हो रहा है जो एक खतरनाक संकेत है। अरावली और मानसून का यह संतुलन ही राजस्थान की कृषि और अर्थव्यवस्था (Economy) का आधार है, जिसे बचाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।
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