साहिबी नदी (Sahibi River) अरावली पर्वतमाला के उत्तरी भाग (Northern Part) से, विशेष रूप से राजस्थान के सीकर जिले की पहाड़ियों से निकलती है। यह नदी हरियाणा के रेवाड़ी, गुरुग्राम और झज्जर जिलों से होकर बहती है और दिल्ली के पास नजफगढ़ नाले (Najafgarh Drain) में जाकर मिलती है। हालांकि यह एक मौसमी नदी (Seasonal River) है, लेकिन मानसून के दौरान इसका बहाव काफी तेज हो जाता है। हरियाणा के अर्ध-शुष्क क्षेत्रों (Semi-arid Regions) के लिए साहिबी नदी एक महत्वपूर्ण जल स्रोत के रूप में कार्य करती है।
डोहान नदी (Dohan River) भी अरावली की पहाड़ियों (Aravali Hills) में नीम का थाना के पास से निकलती है और हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले में प्रवेश करती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस नदी का संबंध भृगु ऋषि (Bhrigu Rishi) से माना जाता है, जो इसके ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व (Spiritual Importance) को बढ़ाता है। साहिबी और डोहान जैसी नदियाँ हरियाणा के दक्षिणी हिस्सों में भूजल स्तर (Groundwater Level) को रिचार्ज करने के लिए उत्तरदायी हैं। इन नदियों का अस्तित्व स्थानीय पारिस्थितिकी (Local Ecology) के लिए बहुत आवश्यक है।
कृषि के क्षेत्र में इन आंतरिक नदियों (Inland Rivers) का योगदान विशेष रूप से मानसून के बाद देखने को मिलता है। जब ये नदियाँ बहती हैं, तो ये अपने साथ उपजाऊ गाद (Silt) लाती हैं जो खेतों की उर्वरता (Fertility) बढ़ाती है। इन नदियों के किनारे बसे गाँव सिंचाई के लिए इन्हीं के जल और इससे रिचार्ज होने वाले कुओं (Wells) पर निर्भर रहते हैं। अरावली की इन छोटी जलधाराओं ने सदियों से हरियाणा के दक्षिणी जिलों की कृषि संस्कृति (Agricultural Culture) को जीवित रखा है।
पर्यावरणीय संकट (Environmental Crisis) के कारण ये नदियाँ अब लुप्त होने की कगार पर हैं, क्योंकि अरावली की पहाड़ियों में अत्यधिक खनन (Mining) ने इनके प्राकृतिक मार्ग को अवरुद्ध कर दिया है। वनों की कटाई से वर्षा कम हुई है, जिससे इन मौसमी नदियों में पानी का आना लगभग बंद हो गया है। डोहान जैसी नदियाँ अब केवल रेत के सूखे रास्तों (Dry Paths) के रूप में दिखाई देती हैं। इन नदियों का पुनरुद्धार (Restoration) हरियाणा के गिरते भूजल स्तर को सुधारने के लिए एकमात्र विकल्प बचा है।
हरियाणा और राजस्थान की सरकारों को मिलकर अरावली की इन 'मृतप्राय' नदियों (Dying Rivers) को बचाने के लिए एकीकृत जल प्रबंधन (Integrated Water Management) योजना बनानी चाहिए। अरावली के जलग्रहण क्षेत्रों में सघन वृक्षारोपण (Afforestation) और छोटे बांधों का निर्माण इन नदियों में फिर से जान फूँक सकता है। यदि हमने इन प्राकृतिक जल प्रणालियों (Natural Water Systems) को नहीं बचाया, तो भविष्य में इन क्षेत्रों को गंभीर जल संकट (Water Crisis) का सामना करना पड़ेगा। अरावली की नदियाँ हमारे पर्यावरण का आधार हैं।