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अरावली पर्वतमाला की भूवैज्ञानिक पहचान (Geological Identity) दो मुख्य समूहों, अरावली सुपरग्रुप (Aravali Supergroup) और दिल्ली सुपरग्रुप में विभाजित है। अरावली सुपरग्रुप अधिक प्राचीन है, जिसकी चट्टानें लगभग 2.5 बिलियन वर्ष पहले बनी थीं और यह मुख्य रूप से दक्षिणी राजस्थान में दिखाई देती हैं। इसके विपरीत, दिल्ली सुपरग्रुप की चट्टानें थोड़ी कम पुरानी (लगभग 1.6 बिलियन वर्ष) हैं और यह श्रृंखला के उत्तरी भाग, जैसे हरियाणा और दिल्ली के रिज (Delhi Ridge) क्षेत्र में फैली हुई हैं। इन दोनों समूहों के बीच का समय अंतराल पृथ्वी के क्रस्ट के बड़े बदलावों को दर्शाता है।

अरावली सुपरग्रुप (Aravali Supergroup) की चट्टानों में मुख्य रूप से मेटा-अवसादी चट्टानें (Meta-sedimentary Rocks) जैसे फिलाइट और अभ्रक शिस्ट पाए जाते हैं। इन चट्टानों का निर्माण प्राचीन समुद्रों के तल में जमा हुए मलबे के रूपांतरण (Metamorphism) से हुआ था। इस समूह में सीसा, जस्ता और तांबे जैसे धातुओं के समृद्ध अयस्क मिलते हैं, जो इसकी पहचान हैं। यह क्षेत्र भूवैज्ञानिक उथल-पुथल (Geological Turmoil) का साक्षी रहा है, जिसके कारण चट्टानें अत्यधिक मुड़ी हुई और मुड़ी हुई (Folded and Faulted) अवस्था में मिलती हैं।

दिल्ली सुपरग्रुप (Delhi Supergroup) की चट्टानी संरचना (Rock Structure) में क्वार्टजाइट (Quartzite) की प्रधानता है, जो बहुत कठोर और अपरदन प्रतिरोधी होती है। यही कारण है कि दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में ये पहाड़ियाँ आज भी टीलों के रूप में सुरक्षित हैं। इस समूह की चट्टानें अधिक बलुआ पत्थर (Sandstone) और ज्वालामुखीय अवसादों से बनी हैं, जो एक अलग वातावरण में उनके निर्माण की ओर संकेत करती हैं। इनमें खनिजों की मात्रा अरावली समूह की तुलना में भिन्न होती है और ये अधिक शुष्क क्षेत्रों में फैली हुई हैं।

इन दोनों सुपरग्रुप्स के बीच का संपर्क क्षेत्र भूविज्ञानी 'मेन बाउंड्री थ्रस्ट' (Main Boundary Thrust) या फॉल्ट लाइन के रूप में पहचानते हैं। यह रेखा बताती है कि कैसे अलग-अलग कालखंडों में टेक्टोनिक गतिविधियाँ (Tectonic Activities) हुईं और नई पर्वत श्रृंखलाएं पुरानी परतों के ऊपर या बगल में विकसित हुईं। इन परतों का अध्ययन करके वैज्ञानिक यह पता लगाते हैं कि प्राचीन काल में भारतीय उपमहाद्वीप (Indian Subcontinent) की जलवायु और समुद्र का स्तर कैसा था। यह विभाजन अरावली के भूवैज्ञानिक विकास (Geological Evolution) का रोडमैप है।

शिक्षा और अनुसंधान (Education and Research) के क्षेत्र में इन दो सुपरग्रुप्स का वर्गीकरण अरावली को समझने का आधार है। जहाँ अरावली सुपरग्रुप खनिजों और प्राचीनता का प्रतीक है, वहीं दिल्ली सुपरग्रुप शहरी पर्यावरण और स्थिरता (Stability) के लिए जाना जाता है। इन दोनों की सुरक्षा और अध्ययन से ही हम अपनी धरती के अतीत को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं। अरावली की ये चट्टानी परतें (Rock Layers) समय की धुल में दबी हुई एक खुली किताब की तरह हैं, जिसे पढ़ना हर पर्यावरण प्रेमी के लिए जरूरी है।

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अरावली पर्वतमाला की भूवैज्ञानिक पहचान (Geological Identity) दो मुख्य समूहों, अरावली सुपरग्रुप (Aravali Supergroup) और दिल्ली सुपरग्रुप में विभाजित है। अरावली सुपरग्रुप अधिक प्राचीन है, जिसकी चट्टानें लगभग 2.5 बिलियन वर्ष पहले बनी थीं और यह मुख्य रूप से दक्षिणी राजस्थान में दिखाई देती हैं। इसके विपरीत, दिल्ली सुपरग्रुप की चट्टानें थोड़ी कम पुरानी (लगभग 1.6 बिलियन वर्ष) हैं और यह श्रृंखला के उत्तरी भाग, जैसे हरियाणा और दिल्ली के रिज (Delhi Ridge) क्षेत्र में फैली हुई हैं। इन दोनों समूहों के बीच का समय अंतराल पृथ्वी के क्रस्ट के बड़े बदलावों को दर्शाता है।

अरावली सुपरग्रुप (Aravali Supergroup) की चट्टानों में मुख्य रूप से मेटा-अवसादी चट्टानें (Meta-sedimentary Rocks) जैसे फिलाइट और अभ्रक शिस्ट पाए जाते हैं। इन चट्टानों का निर्माण प्राचीन समुद्रों के तल में जमा हुए मलबे के रूपांतरण (Metamorphism) से हुआ था। इस समूह में सीसा, जस्ता और तांबे जैसे धातुओं के समृद्ध अयस्क मिलते हैं, जो इसकी पहचान हैं। यह क्षेत्र भूवैज्ञानिक उथल-पुथल (Geological Turmoil) का साक्षी रहा है, जिसके कारण चट्टानें अत्यधिक मुड़ी हुई और मुड़ी हुई (Folded and Faulted) अवस्था में मिलती हैं।

दिल्ली सुपरग्रुप (Delhi Supergroup) की चट्टानी संरचना (Rock Structure) में क्वार्टजाइट (Quartzite) की प्रधानता है, जो बहुत कठोर और अपरदन प्रतिरोधी होती है। यही कारण है कि दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में ये पहाड़ियाँ आज भी टीलों के रूप में सुरक्षित हैं। इस समूह की चट्टानें अधिक बलुआ पत्थर (Sandstone) और ज्वालामुखीय अवसादों से बनी हैं, जो एक अलग वातावरण में उनके निर्माण की ओर संकेत करती हैं। इनमें खनिजों की मात्रा अरावली समूह की तुलना में भिन्न होती है और ये अधिक शुष्क क्षेत्रों में फैली हुई हैं।

इन दोनों सुपरग्रुप्स के बीच का संपर्क क्षेत्र भूविज्ञानी 'मेन बाउंड्री थ्रस्ट' (Main Boundary Thrust) या फॉल्ट लाइन के रूप में पहचानते हैं। यह रेखा बताती है कि कैसे अलग-अलग कालखंडों में टेक्टोनिक गतिविधियाँ (Tectonic Activities) हुईं और नई पर्वत श्रृंखलाएं पुरानी परतों के ऊपर या बगल में विकसित हुईं। इन परतों का अध्ययन करके वैज्ञानिक यह पता लगाते हैं कि प्राचीन काल में भारतीय उपमहाद्वीप (Indian Subcontinent) की जलवायु और समुद्र का स्तर कैसा था। यह विभाजन अरावली के भूवैज्ञानिक विकास (Geological Evolution) का रोडमैप है।

शिक्षा और अनुसंधान (Education and Research) के क्षेत्र में इन दो सुपरग्रुप्स का वर्गीकरण अरावली को समझने का आधार है। जहाँ अरावली सुपरग्रुप खनिजों और प्राचीनता का प्रतीक है, वहीं दिल्ली सुपरग्रुप शहरी पर्यावरण और स्थिरता (Stability) के लिए जाना जाता है। इन दोनों की सुरक्षा और अध्ययन से ही हम अपनी धरती के अतीत को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं। अरावली की ये चट्टानी परतें (Rock Layers) समय की धुल में दबी हुई एक खुली किताब की तरह हैं, जिसे पढ़ना हर पर्यावरण प्रेमी के लिए जरूरी है।
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