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अरावली को बचाने की दिशा में एक बड़ी चर्चा इसे पूर्ण रूप से 'पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र' (Eco-Sensitive Zone - ESZ) घोषित करने को लेकर चल रही है। पर्यावरण कार्यकर्ताओं और कई विशेषज्ञ समितियों (Expert Committees) ने केंद्र सरकार से सिफारिश की है कि अरावली की पूरी श्रृंखला को विशेष संरक्षण प्राप्त होना चाहिए। वर्तमान में, केवल कुछ चुनिंदा वन्यजीव अभयारण्यों के आसपास ही यह दर्जा प्राप्त है। यदि इसे समग्र रूप से ESZ घोषित किया जाता है, तो पूरी पर्वतमाला में किसी भी तरह के भारी उद्योग और व्यावसायिक निर्माण (Commercial Construction) पर स्थाई रोक लग जाएगी।

दिसंबर 2025 में पर्यावरण मंत्रालय (MoEFCC) ने संकेत दिए हैं कि वे अरावली के लिए एक 'रीजनल मैनेजमेंट प्लान' (Regional Management Plan) तैयार कर रहे हैं। इस योजना के तहत पहाड़ियों को उनके पर्यावरणीय महत्व के आधार पर अलग-अलग जोन में बाँटा जाएगा। 'कोर जोन' (Core Zone) में किसी भी प्रकार की मानवीय गतिविधि की अनुमति नहीं होगी, जबकि बफर जोन में केवल पर्यावरण के अनुकूल पर्यटन (Eco-tourism) की इजाजत दी जा सकती है। यह पहल अरावली की निरंतरता (Continuity) को बनाए रखने के लिए बहुत जरूरी है।

ESZ घोषित होने से सबसे बड़ा बदलाव भूमि उपयोग (Land Use) के नियमों में आएगा। वर्तमान में, अरावली के कई हिस्सों को 'राजस्व भूमि' या 'बंजर भूमि' के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जिसका फायदा उठाकर रियल एस्टेट (Real Estate) कंपनियां वहां कॉलोनियां और फार्महाउस बना लेती हैं। संवेदनशील क्षेत्र का दर्जा मिलने के बाद, इन जमीनों का हस्तांतरण लगभग असंभव हो जाएगा। यह अरावली के संरक्षण (Preservation) के लिए एक मज़बूत कानूनी ढाल (Legal Shield) साबित होगा।

हालांकि, इस प्रस्ताव का कुछ औद्योगिक समूहों और राज्यों द्वारा विरोध भी किया जा रहा है, क्योंकि इससे आर्थिक गतिविधियों (Economic Activities) पर असर पड़ सकता है। सरकार अब एक मध्य मार्ग खोजने की कोशिश कर रही है जहाँ विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बना रहे। 2026 में इस पर कोई बड़ा नीतिगत निर्णय (Policy Decision) आने की प्रबल संभावना है। स्थानीय समुदायों को भी इसके प्रति जागरूक किया जा रहा है ताकि वे इसके फायदों को समझ सकें।

अरावली को 'इको-सेंसिटिव जोन' (ESZ) घोषित करना न केवल यहाँ के वन्यजीवों के लिए, बल्कि उत्तर भारत की जल सुरक्षा (Water Security) के लिए भी मास्टरस्ट्रोक होगा। इससे अरावली के प्राकृतिक झरनों और भूजल स्रोतों को प्रदूषण से बचाया जा सकेगा। पहाड़ियों का यह कानूनी संरक्षण वास्तव में आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का बीमा (Insurance of Future) है। अरावली की नवीनतम खबरों में यह मुद्दा सबसे ऊपर बना हुआ है और जल्द ही इस पर अंतिम मोहर लगने की उम्मीद है।

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अरावली को बचाने की दिशा में एक बड़ी चर्चा इसे पूर्ण रूप से 'पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र' (Eco-Sensitive Zone - ESZ) घोषित करने को लेकर चल रही है। पर्यावरण कार्यकर्ताओं और कई विशेषज्ञ समितियों (Expert Committees) ने केंद्र सरकार से सिफारिश की है कि अरावली की पूरी श्रृंखला को विशेष संरक्षण प्राप्त होना चाहिए। वर्तमान में, केवल कुछ चुनिंदा वन्यजीव अभयारण्यों के आसपास ही यह दर्जा प्राप्त है। यदि इसे समग्र रूप से ESZ घोषित किया जाता है, तो पूरी पर्वतमाला में किसी भी तरह के भारी उद्योग और व्यावसायिक निर्माण (Commercial Construction) पर स्थाई रोक लग जाएगी।

दिसंबर 2025 में पर्यावरण मंत्रालय (MoEFCC) ने संकेत दिए हैं कि वे अरावली के लिए एक 'रीजनल मैनेजमेंट प्लान' (Regional Management Plan) तैयार कर रहे हैं। इस योजना के तहत पहाड़ियों को उनके पर्यावरणीय महत्व के आधार पर अलग-अलग जोन में बाँटा जाएगा। 'कोर जोन' (Core Zone) में किसी भी प्रकार की मानवीय गतिविधि की अनुमति नहीं होगी, जबकि बफर जोन में केवल पर्यावरण के अनुकूल पर्यटन (Eco-tourism) की इजाजत दी जा सकती है। यह पहल अरावली की निरंतरता (Continuity) को बनाए रखने के लिए बहुत जरूरी है।

ESZ घोषित होने से सबसे बड़ा बदलाव भूमि उपयोग (Land Use) के नियमों में आएगा। वर्तमान में, अरावली के कई हिस्सों को 'राजस्व भूमि' या 'बंजर भूमि' के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जिसका फायदा उठाकर रियल एस्टेट (Real Estate) कंपनियां वहां कॉलोनियां और फार्महाउस बना लेती हैं। संवेदनशील क्षेत्र का दर्जा मिलने के बाद, इन जमीनों का हस्तांतरण लगभग असंभव हो जाएगा। यह अरावली के संरक्षण (Preservation) के लिए एक मज़बूत कानूनी ढाल (Legal Shield) साबित होगा।

हालांकि, इस प्रस्ताव का कुछ औद्योगिक समूहों और राज्यों द्वारा विरोध भी किया जा रहा है, क्योंकि इससे आर्थिक गतिविधियों (Economic Activities) पर असर पड़ सकता है। सरकार अब एक मध्य मार्ग खोजने की कोशिश कर रही है जहाँ विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बना रहे। 2026 में इस पर कोई बड़ा नीतिगत निर्णय (Policy Decision) आने की प्रबल संभावना है। स्थानीय समुदायों को भी इसके प्रति जागरूक किया जा रहा है ताकि वे इसके फायदों को समझ सकें।

अरावली को 'इको-सेंसिटिव जोन' (ESZ) घोषित करना न केवल यहाँ के वन्यजीवों के लिए, बल्कि उत्तर भारत की जल सुरक्षा (Water Security) के लिए भी मास्टरस्ट्रोक होगा। इससे अरावली के प्राकृतिक झरनों और भूजल स्रोतों को प्रदूषण से बचाया जा सकेगा। पहाड़ियों का यह कानूनी संरक्षण वास्तव में आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का बीमा (Insurance of Future) है। अरावली की नवीनतम खबरों में यह मुद्दा सबसे ऊपर बना हुआ है और जल्द ही इस पर अंतिम मोहर लगने की उम्मीद है।
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