भारत के कई राज्यों में होलिका दहन के अगले दिन सुबह 'ठंडी होली' या 'धुलेंडी' (Dhulendi) की पूजा की परंपरा है। इसमें माताएं अपनी संतान (Offspring) के अच्छे स्वास्थ्य और लंबी आयु के लिए पूजा करती हैं। ठंडे पानी, दही और ताजी राख से शीतला माता (Goddess Shitala) का ध्यान किया जाता है। यह मान्यता है कि इस पूजा से बच्चों को मौसमी बीमारियों और बुरी नजर (Evil Eye) से सुरक्षा मिलती है।
पूजा की थाली में भीगे हुए चने, गुड़ और मूंग की दाल (Moong Dal) का उपयोग किया जाता है। होलिका की जली हुई राख को माथे पर लगाकर आशीर्वाद (Blessings) लिया जाता है। यह राख औषधीय गुणों से भरपूर मानी जाती है जो त्वचा संबंधी रोगों के निवारण में सहायक होती है। माताओं का यह समर्पण और त्याग (Sacrifice) परिवार को एक सूत्र में बांधकर रखने की शक्ति प्रदान करता है।
धुलेंडी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद घर के मंदिर में दीप जलाना चाहिए। पितरों (Ancestors) का तर्पण करना और उनके नाम से अन्न निकालना भी इस दिन की एक विशेष परंपरा है। यह पितृ ऋण (Paternal Debt) से मुक्ति और वंश की वृद्धि के लिए एक आवश्यक संस्कार माना जाता है। अपनी संस्कृति के प्रति यह सम्मान (Respect) आने वाली पीढ़ियों को अच्छे संस्कार देने का एक माध्यम है।
राजस्थान और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में इस दिन स्त्रियाँ मिलकर गीत (Folk Songs) गाती हैं और सामूहिक रूप से पूजा स्थल तक जाती हैं। यह सामाजिक समरसता (Social Harmony) का एक बेहतरीन उदाहरण है जहाँ कोई भेदभाव नहीं होता। पूजा के बाद बच्चों को नए वस्त्र (New Clothes) पहनाना और उन्हें मिठाई खिलाना उनके उत्साह को बढ़ाता है। यह दिन बचपन की मासूमियत और पारिवारिक प्रेम (Family Love) का उत्सव है।
इस पूजा का वैज्ञानिक पहलू (Scientific Aspect) भी है, जो ऋतु परिवर्तन (Season Change) के समय शरीर को ठंडे आहार और शांत मन के लिए तैयार करता है। वसंत से ग्रीष्म की ओर बढ़ते समय यह शांतिपूर्ण पूजन मन को स्थिरता प्रदान करता है। 'ठंडी होली' की यह पूजा हमें सिखाती है कि उल्लास के साथ-साथ शांति और संयम (Restraint) भी जीवन के लिए अनिवार्य है। यह एक संतुलित जीवन शैली (Balanced Lifestyle) का आधार है।