दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु में, इस पर्व को 'पोंगल' (Pongal) के रूप में चार दिनों तक अत्यंत भक्तिभाव से मनाया जाता है। पहले दिन 'भोगी' (Bhogi) पर पुरानी चीजों को जलाकर घर की सफाई की जाती है, जो बुराई के अंत का प्रतीक है। दूसरे दिन मुख्य पूजा होती है जहाँ मिट्टी के नए बर्तन (Earthen Pots) में दूध और नए चावल उबाले जाते हैं। जब दूध उबलकर बाहर गिरता है, तो लोग "पोंगल-ओ-पोंगल" (Pongal-o-Pongal) के नारे लगाकर खुशी प्रकट करते हैं।
यह उत्सव पूरी तरह से प्रकृति और कृषि (Nature and Agriculture) को समर्पित है, जहाँ सूर्य देव को विशेष रूप से धन्यवाद दिया जाता है। ताजे गन्ने (Sugarcane) और हल्दी के पौधों से घरों को सजाना बहुत शुभ माना जाता है। पोंगल का मीठा प्रसाद (Sweet Offering) परिवार और मित्रों के बीच बांटा जाता है जो रिश्तों में मधुरता लाता है। दक्षिण भारतीय वास्तुकला और कोलम (Kolam/Rangoli) इस त्यौहार के दौरान अपने चरम सौंदर्य पर होते हैं।
तीसरे दिन 'माट्टु पोंगल' (Mattu Pongal) मनाया जाता है, जो पूरी तरह से बैलों और गायों के प्रति सम्मान (Respect for Animals) व्यक्त करने का दिन है। पशुओं को नहलाकर उनके सींगों को रंगा जाता है और उन्हें विशेष भोजन कराया जाता है। ग्रामीण इलाकों में 'जल्लीकट्टू' (Jallikattu) जैसे पारंपरिक साहसिक खेल भी आयोजित किए जाते हैं। यह जानवरों के प्रति मानवीय संवेदना (Human Sensitivity) और आभार प्रकट करने की एक अद्भुत रस्म है।
अंतिम दिन 'कानुम पोंगल' (Kaanum Pongal) पर लोग अपने रिश्तेदारों से मिलने जाते हैं और बड़ों का आशीर्वाद (Blessings) लेते हैं। नदियों के किनारे पिकनिक मनाना और सामूहिक नृत्य (Group Dance) करना इस दिन की मुख्य विशेषता है। यह दिन सामाजिक बंधनों को मज़बूत करने और नए मित्र बनाने का अवसर प्रदान करता है। दक्षिण भारत की यह परंपरा (South Indian Tradition) प्रेम और कृतज्ञता का एक अनुपम उदाहरण है।
पोंगल का उत्सव हमें यह सिखाता है कि हमारी सफलता और सुख में प्रकृति (Nature) का सबसे बड़ा योगदान है। यह त्यौहार सूर्य के प्रति श्रद्धा और मिट्टी के प्रति प्रेम का संगम है। पारंपरिक संगीत (Traditional Music) और नृत्य उत्सव के माहौल को भक्तिमय और जीवंत बना देते हैं। मकर संक्रांति के इस स्वरूप को देखना हर किसी के लिए एक प्रेरणादायक अनुभव (Inspiring Experience) होता है।