मकर संक्रांति के पावन पर्व पर पवित्र नदियों में स्नान (Holy Dip) करने की रस्म सदियों पुरानी है। धार्मिक मान्यताओं (Religious Beliefs) के अनुसार, जब सूर्य देव मकर राशि (Capricorn Sign) में प्रवेश करते हैं, तो उस समय को 'पुण्य काल' (Auspicious Period) कहा जाता है। इस विशेष समय में किया गया स्नान व्यक्ति के पुराने पापों का नाश करता है और आत्मा को शुद्ध (Purify) करता है। भारत में प्रयागराज, हरिद्वार और गंगासागर जैसे तीर्थ स्थलों पर लाखों श्रद्धालु इस रस्म को निभाने के लिए एकत्रित होते हैं।
स्नान के पश्चात सूर्य देव को अर्घ्य (Water Offering) देना और उनकी उपासना करना अनिवार्य माना गया है। तांबे के पात्र (Copper Vessel) में जल भरकर उसमें लाल फूल और अक्षत मिलाकर सूर्य की ओर मुख करके चढ़ाना चाहिए। यह क्रिया शरीर में नई ऊर्जा (Energy) का संचार करती है और मानसिक शांति प्रदान करती है। शास्त्रों में उल्लेख है कि उत्तरायण (Uttarayana) के समय सूर्य की किरणें अधिक कल्याणकारी और स्वास्थ्यवर्धक होती हैं।
दान-पुण्य (Charity and Virtue) इस त्यौहार की दूसरी सबसे महत्वपूर्ण रस्म है। स्नान के बाद गरीबों और जरूरतमंदों को अपनी सामर्थ्य के अनुसार नए वस्त्र, कंबल (Blankets) और अनाज का दान करना चाहिए। विशेष रूप से काले तिल (Black Sesame) का दान करना शनि दोषों के निवारण के लिए उत्तम माना गया है। यह परंपरा समाज में समानता और सेवा (Service to Humanity) की भावना को दृढ़ करती है।
भोजन में नई फसल (New Harvest) का उपयोग करना और उसे भगवान को अर्पित करना एक कृषि प्रधान रस्म है। नए चावल और मूंग की दाल से बनी खिचड़ी (Khichdi) का सेवन और दान इस दिन की मुख्य पहचान है। घी, गुड़ और तिल से बने व्यंजन ऊर्जा का मुख्य स्रोत (Source of Energy) होते हैं जो सर्दियों के मौसम में शरीर को गर्माहट प्रदान करते हैं। यह रस्म प्रकृति के प्रति हमारी कृतज्ञता (Gratitude toward Nature) को दर्शाती है।
शाम के समय दीप दान (Lamp Offering) करना और घर के आंगन में रंगोली बनाना खुशहाली का प्रतीक है। मकर संक्रांति हमें पुराने कलह और द्वेष को त्यागकर नए जीवन (New Life) की शुरुआत करने का संदेश देती है। इस दिन गायों को चारा खिलाना और उनकी पूजा करना भी एक पुण्यकारी रस्म मानी जाती है। श्रद्धा और विश्वास (Faith and Belief) के साथ निभाई गई ये रस्में जीवन में सुख-समृद्धि लाती हैं।