खिचड़ी पर्व के दिन दान-पुण्य करने का समय बहुत महत्वपूर्ण माना गया है, जिसे पुण्य काल (Auspicious Period) कहा जाता है। जब सूर्य मकर राशि (Capricorn Sign) में प्रवेश करते हैं, तब से लेकर अगले कुछ घंटों तक दान करना विशेष फलदायी होता है। इस समय किया गया दान सीधे तौर पर हमारे पूर्वजों (Ancestors) को तृप्त करता है और आने वाले वर्ष में उन्नति के द्वार खोलता है। लोग सुबह जल्दी पवित्र स्नान (Holy Bath) के बाद ही दान की प्रक्रिया शुरू करते हैं।
पौराणिक कथाओं (Mythological Tales) के अनुसार, खिचड़ी पर्व की शुरुआत बाबा गोरखनाथ (Baba Gorakhnath) के समय से मानी जाती है। कहा जाता है कि जब खिलजी के आक्रमण के समय योगी भोजन नहीं बना पा रहे थे, तब बाबा गोरखनाथ ने दाल और चावल को मिलाकर एक व्यंजन (Dish) तैयार करने की सलाह दी थी। यह भोजन बहुत जल्दी तैयार हो गया और इससे योगियों को तुरंत शक्ति (Instant Energy) मिली। तब से इसे 'खिचड़ी' नाम दिया गया और यह शक्ति का प्रतीक बन गया।
गोरखपुर के प्रसिद्ध मंदिर में आज भी मकर संक्रांति पर खिचड़ी मेला (Khichdi Fair) लगता है, जहाँ श्रद्धालु खिचड़ी चढ़ाते हैं। यह मान्यता है कि इस दिन खिचड़ी चढ़ाने से भगवान शिव (Lord Shiva) का आशीर्वाद प्राप्त होता है और सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। इतिहासकार इसे एकता और संघर्ष के बीच उपजे एक सरल जीवन जीने के तरीके (Way of Life) के रूप में देखते हैं। यह कथा हमें कठिन समय में धैर्य और संसाधनशीलता (Resourcefulness) की शिक्षा देती है।
दान की सामग्री में केवल अन्न ही नहीं, बल्कि वस्त्र और कंबल (Blankets) भी शामिल किए जाते हैं। कड़ाके की ठंड में किसी गरीब को गरम भोजन और कपड़े देना ईश्वर की सच्ची सेवा (Service to God) मानी गई है। खिचड़ी दान (Donation of Khichdi) करने से शनि और राहु जैसे ग्रहों के नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं। यह रस्म मनुष्य को उदार और परोपकारी (Benevolent) बनने के लिए प्रेरित करती है।
ज्योतिष शास्त्र (Astrology) के अनुसार, खिचड़ी पर्व पर किया गया त्याग हमारे संचित कर्मों (Accumulated Deeds) को शुद्ध करता है। दान करते समय मन में निस्वार्थ भाव और श्रद्धा होना अनिवार्य है। यह त्यौहार केवल खाने-पीने का नहीं, बल्कि समाज के प्रति अपने कर्तव्यों (Duties) को निभाने का है। खिचड़ी की सरलता हमें सादगीपूर्ण जीवन (Simple Living) अपनाने का संदेश देती है।