उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र और बिहार में मकर संक्रांति को मुख्य रूप से 'खिचड़ी' के नाम से ही पुकारा जाता है। इस दिन की शुरुआत गंगा, यमुना या अन्य पवित्र नदियों के संगम (Confluence) पर डुबकी लगाने से होती है। लोग कड़ाके की ठंड की परवाह किए बिना सुबह-सुबह स्नान करते हैं, जिसे 'मोक्ष की डुबकी' (Dip of Salvation) माना जाता है। स्नान के बाद सूर्य देव को अर्घ्य (Water Offering) देना इस दिन की पहली महत्वपूर्ण रस्म है।
बिहार में इस त्यौहार पर दही-चूड़ा और गुड़ (Curd-Chuda and Jaggery) खाने का विशेष रिवाज है। इसके साथ ही तिलकुट (Tilkut) का स्वाद त्यौहार के उल्लास को बढ़ा देता है, जो विशेष रूप से गया जिले में बनाया जाता है। दोपहर के भोजन में भव्य खिचड़ी का आयोजन होता है, जिसमें आलू का चोखा और घी (Mashed Potato and Ghee) अनिवार्य रूप से शामिल होते हैं। यह भोजन परिवार के सभी सदस्यों को एक साथ लाने का एक सशक्त जरिया (Medium) है।
गाँवों में इस दिन 'खिचड़ी भोज' (Community Feast) का आयोजन किया जाता है, जहाँ पूरा मोहल्ला एक साथ बैठकर भोजन करता है। लोग एक-दूसरे के घर जाकर "खिचड़ी खईला की ना" (Have you eaten Khichdi) जैसे सवाल पूछते हैं, जो आपसी प्रेम और भाईचारे (Brotherhood) को दर्शाता है। यह त्यौहार जात-पात के भेदभाव को मिटाकर सामाजिक सद्भाव (Social Harmony) का संदेश फैलाता है। स्थानीय लोकगीत (Folk Songs) उत्सव के माहौल को और भी रंगीन बना देते हैं।
खिचड़ी पर्व पर बच्चों के बीच पतंगबाजी (Kite Flying) की जबरदस्त होड़ रहती है। छतों पर चढ़कर पतंग काटना और जोर-जोर से शोर मचाना इस दिन की मुख्य खुशी है। बाजारों में रंग-बिरंगी पतंगें और लटाई (Kites and Spools) की दुकानें सज जाती हैं। यह खेल धैर्य और एकाग्रता (Patience and Concentration) बढ़ाने में मदद करता है। बड़ों के लिए यह अपनी यादों को ताजा करने का एक अवसर होता है।
शाम के समय लोग एक-दूसरे को तिल और गुड़ की मिठाइयाँ बांटते हैं। यह मान्यता है कि गुड़ की तरह मीठा बोलना और तिल की तरह मिलजुल कर रहना ही जीवन की सफलता है। उत्तर भारतीय संस्कृति (North Indian Culture) में खिचड़ी केवल एक पकवान नहीं, बल्कि एक भावना (Emotion) है। यह पर्व हमारी प्राचीन जड़ों (Ancient Roots) और आधुनिक उत्साह का एक अद्भुत मेल है।