मकर संक्रांति और लोहड़ी के पर्व पर 'तिल और गुड़' (Sesame and Jaggery) का संगम अनिवार्य माना जाता है। तिल की तासीर गर्म होती है और यह कैल्शियम का बेहतरीन स्रोत (Source of Calcium) है, जो सर्दियों में स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभकारी है। गुड़ आयरन प्रदान करता है और शरीर की अशुद्धियों को बाहर निकालता है (Detoxifies Body)। इन दोनों का मिश्रण न केवल स्वादिष्ट है, बल्कि यह एक आयुर्वेदिक औषधि (Ayurvedic Medicine) की तरह कार्य करता है।
सामाजिक रूप से तिल-गुड़ बांटने का अर्थ है कड़वाहट को मिटाकर मधुर संबंध (Sweet Relationships) बनाना। महाराष्ट्र में लोग "तिल-गुड़ घ्या, गोड-गोड बोला" कहते हैं, जिसका अर्थ है तिल-गुड़ लें और मीठा बोलें। यह रस्म समाज में आपसी प्रेम और भाईचारे (Brotherhood) को प्रगाढ़ करती है। तिल के छोटे-छोटे दाने एकता के प्रतीक हैं, जो मिलकर एक मीठे लड्डू का आकार लेते हैं।
विभिन्न क्षेत्रों में तिल से बनी 'गजक' और 'पट्टी' (Gajak and Patti) का खूब प्रचलन है, जो कड़ाके की ठंड में स्नैक्स के रूप में खाए जाते हैं। नई फसल (New Harvest) से प्राप्त सामग्रियों का उपयोग करना प्रकृति के प्रति सम्मान व्यक्त करने का तरीका है। किसान अपनी मेहनत से उपजी फसलों का पहला हिस्सा भगवान को अर्पित (Offering to God) करते हैं। यह त्यौहार श्रम की महत्ता और संतोष (Satisfaction) का पाठ पढ़ाता है।
आजकल 'शुद्ध शहद' (Pure Honey) और ड्राई फ्रूट्स के साथ बने तिल के लड्डू भी बहुत लोकप्रिय हो रहे हैं। ये उत्पाद आधुनिक स्वास्थ्य मानकों (Modern Health Standards) के साथ हमारी परंपराओं का मेल हैं। संक्रांति पर बनाए गए ये पकवान हफ्तों तक खराब नहीं होते और ऊर्जा का मुख्य स्रोत बने रहते हैं। मेहमानों का स्वागत इन पारंपरिक मिठाइयों (Traditional Sweets) से करना भारतीय संस्कृति की सुंदरता है।
तिल और गुड़ का सेवन करने से त्वचा में चमक (Skin Glow) आती है और रक्त संचार बेहतर होता है। लोहड़ी की आग में तिल फेंकना भी इसी वैज्ञानिक कारण से जुड़ा है कि वातावरण की हवा शुद्ध हो सके। यह पर्व हमें सिखाता है कि जो कुछ भी हमें प्रकृति से मिलता है, उसे हमें बांटकर और आनंद (Joy and Sharing) के साथ ग्रहण करना चाहिए। स्वाद और सेहत का यह बेजोड़ संगम ही संक्रांति की असली पहचान है।