जलीकट्टू एक प्राचीन और साहसी खेल है जो थाई पोंगल के तीसरे दिन, जिसे 'माट्टु पोंगल' (Mattu Pongal) कहते हैं, आयोजित किया जाता है। यह खेल बैलों की शक्ति (Power of Bulls) और युवाओं के शौर्य का प्रदर्शन है। इसका उद्देश्य सर्वश्रेष्ठ प्रजनन सांडों (Best Breeding Bulls) की पहचान करना है ताकि स्वदेशी नस्लों (Indigenous Breeds) को संरक्षित किया जा सके। यह तमिल वीरता (Tamil Valor) और कृषि संस्कृति का एक अटूट हिस्सा है।
इस खेल के नियम बहुत ही कड़े और पारंपरिक (Strict and Traditional) होते हैं। खिलाड़ियों को दौड़ते हुए बैल के कूबड़ (Hump) को पकड़कर उसे एक निश्चित समय या दूरी तक नियंत्रित करना होता है। इसमें बैल को नुकसान पहुँचाना या पूंछ पकड़ना सख्त मना है, क्योंकि यह खेल पशु के प्रति सम्मान (Respect for Animals) पर आधारित है। विजेता खिलाड़ियों को नकद पुरस्कार, स्वर्ण सिक्के या नए बर्तन (Utensils) भेंट किए जाते हैं।
सुरक्षा की दृष्टि से अब जलीकट्टू के आयोजन में पशु चिकित्सा डॉक्टरों (Veterinary Doctors) और जिला प्रशासन की निगरानी अनिवार्य होती है। बैलों का स्वास्थ्य परीक्षण किया जाता है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वे पूरी तरह फिट (Fit and Healthy) हैं। खिलाड़ियों का भी शारीरिक परीक्षण (Physical Test) होता है ताकि दुर्घटनाओं की संभावना कम हो सके। यह आधुनिक सुरक्षा मानकों (Safety Standards) और प्राचीन परंपराओं का एक अनूठा समन्वय है।
गाँवों में जलीकट्टू का माहौल किसी बड़े उत्सव (Grand Celebration) से कम नहीं होता। हजारों की संख्या में दर्शक एकत्रित होते हैं और अपने पसंदीदा खिलाड़ियों व बैलों का उत्साहवर्धन (Encouragement) करते हैं। यह आयोजन सामाजिक एकता और सामुदायिक गौरव (Community Pride) का संचार करता है। यह खेल सिखाता है कि कैसे मनुष्य और पशु एक-दूसरे की शक्ति का सम्मान करते हुए साथ रह सकते हैं।
जलीकट्टू का विरोध और समर्थन दोनों ही खबरों में रहे हैं, लेकिन स्थानीय लोगों के लिए यह उनकी पहचान (Identity) का मामला है। वे अपने बैलों को परिवार के सदस्य की तरह पालते हैं और उन्हें विशेष आहार (Special Diet) प्रदान करते हैं। थाई पोंगल के दौरान यह आयोजन वीरता और परंपरा (Tradition and Heroism) की नई कहानियाँ बुनता है। यह खेल आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों और संस्कृति (Culture and Roots) पर गर्व करना सिखाता है।