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पोंगल उत्सव का तीसरा दिन 'माट्टु पोंगल' (Mattu Pongal) के रूप में मनाया जाता है, जो पूरी तरह से कृषि में सहायक पशुओं (Agricultural Animals) को समर्पित है। किसान अपने बैलों और गायों (Bulls and Cows) को भगवान का रूप मानते हैं क्योंकि वे साल भर खेतों में मेहनत कर अन्न उपजाते हैं। इस दिन पशुओं को नदियों या जलाशयों में ले जाकर नहलाया जाता है और उनकी मालिश (Massage) की जाती है। यह रस्म मनुष्य और पशुओं के बीच के अटूट संबंध (Deep Bond) को दर्शाती है।

धार्मिक कथाओं (Religious Tales) के अनुसार, भगवान शिव ने अपने बैल नंदी (Nandi) को पृथ्वी पर यह संदेश देने भेजा था कि मनुष्य प्रतिदिन तेल मालिश करें और महीने में एक बार भोजन करें। लेकिन नंदी ने गलती से कह दिया कि प्रतिदिन भोजन करें और महीने में एक बार तेल मालिश करें। इस गलती की सजा के रूप में शिव ने नंदी को पृथ्वी पर रहकर किसानों की खेती (Farming) में मदद करने का आदेश दिया। तभी से पशुओं के प्रति कृतज्ञता (Gratitude) व्यक्त करने के लिए यह पर्व मनाया जाता है।

इस दिन पशुओं के सींगों को चमकीले रंगों (Bright Colors) से रंगा जाता है और उनके गले में तांबे की घंटियाँ (Copper Bells) बाँधी जाती हैं। उन्हें मालाएँ पहनाई जाती हैं और विशेष भोजन जैसे पोंगल और गन्ने (Sugarcane and Pongal) खिलाए जाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में बैलों की दौड़ और जलीकट्टू (Jallikattu) जैसे साहसी खेलों का आयोजन किया जाता है। यह उत्सव पशुधन की सुरक्षा और संवर्धन (Protection and Preservation of Livestock) का संदेश देता है।

माट्टु पोंगल के दिन गौशालाओं (Cow Sheds) को साफ किया जाता है और धूप-दीप से उनकी आरती उतारी जाती है। लोग मानते हैं कि गौ सेवा (Service to Cows) करने से घर में शांति और लक्ष्मी का वास होता है। यह दिन शहरी समाज को भी यह याद दिलाता है कि हमारा भोजन मिट्टी और पशुओं के परिश्रम (Hard Work) से आता है। पशुओं को सम्मान देना हमारी महान भारतीय विरासत (Indian Heritage) का हिस्सा है।

शाम के समय गाँवों में ढोल-नगाड़ों (Drums) के साथ जुलूस निकाला जाता है और लोग खुशियाँ मनाते हैं। यह त्यौहार यह भी सिखाता है कि जो जीव हमें आजीविका (Livelihood) प्रदान करते हैं, उनकी देखभाल करना हमारा नैतिक कर्तव्य (Moral Duty) है। माट्टु पोंगल की खुशियाँ प्रकृति के प्रति हमारे समर्पण (Devotion to Nature) को मज़बूत करती हैं। पशुओं की पूजा वास्तव में अहिंसा और दया (Non-violence and Kindness) का त्यौहार है।

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पोंगल उत्सव का तीसरा दिन 'माट्टु पोंगल' (Mattu Pongal) के रूप में मनाया जाता है, जो पूरी तरह से कृषि में सहायक पशुओं (Agricultural Animals) को समर्पित है। किसान अपने बैलों और गायों (Bulls and Cows) को भगवान का रूप मानते हैं क्योंकि वे साल भर खेतों में मेहनत कर अन्न उपजाते हैं। इस दिन पशुओं को नदियों या जलाशयों में ले जाकर नहलाया जाता है और उनकी मालिश (Massage) की जाती है। यह रस्म मनुष्य और पशुओं के बीच के अटूट संबंध (Deep Bond) को दर्शाती है।

धार्मिक कथाओं (Religious Tales) के अनुसार, भगवान शिव ने अपने बैल नंदी (Nandi) को पृथ्वी पर यह संदेश देने भेजा था कि मनुष्य प्रतिदिन तेल मालिश करें और महीने में एक बार भोजन करें। लेकिन नंदी ने गलती से कह दिया कि प्रतिदिन भोजन करें और महीने में एक बार तेल मालिश करें। इस गलती की सजा के रूप में शिव ने नंदी को पृथ्वी पर रहकर किसानों की खेती (Farming) में मदद करने का आदेश दिया। तभी से पशुओं के प्रति कृतज्ञता (Gratitude) व्यक्त करने के लिए यह पर्व मनाया जाता है।

इस दिन पशुओं के सींगों को चमकीले रंगों (Bright Colors) से रंगा जाता है और उनके गले में तांबे की घंटियाँ (Copper Bells) बाँधी जाती हैं। उन्हें मालाएँ पहनाई जाती हैं और विशेष भोजन जैसे पोंगल और गन्ने (Sugarcane and Pongal) खिलाए जाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में बैलों की दौड़ और जलीकट्टू (Jallikattu) जैसे साहसी खेलों का आयोजन किया जाता है। यह उत्सव पशुधन की सुरक्षा और संवर्धन (Protection and Preservation of Livestock) का संदेश देता है।

माट्टु पोंगल के दिन गौशालाओं (Cow Sheds) को साफ किया जाता है और धूप-दीप से उनकी आरती उतारी जाती है। लोग मानते हैं कि गौ सेवा (Service to Cows) करने से घर में शांति और लक्ष्मी का वास होता है। यह दिन शहरी समाज को भी यह याद दिलाता है कि हमारा भोजन मिट्टी और पशुओं के परिश्रम (Hard Work) से आता है। पशुओं को सम्मान देना हमारी महान भारतीय विरासत (Indian Heritage) का हिस्सा है।

शाम के समय गाँवों में ढोल-नगाड़ों (Drums) के साथ जुलूस निकाला जाता है और लोग खुशियाँ मनाते हैं। यह त्यौहार यह भी सिखाता है कि जो जीव हमें आजीविका (Livelihood) प्रदान करते हैं, उनकी देखभाल करना हमारा नैतिक कर्तव्य (Moral Duty) है। माट्टु पोंगल की खुशियाँ प्रकृति के प्रति हमारे समर्पण (Devotion to Nature) को मज़बूत करती हैं। पशुओं की पूजा वास्तव में अहिंसा और दया (Non-violence and Kindness) का त्यौहार है।
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