खेती के उपकरणों की पूजा करना उझावर थिरुनाल का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसे 'करुवी पूजई' (Karuvi Poojai) के नाम से भी जाना जाता है। किसान अपने हल, कुदाल, और दरांती (Sickle and Plough) जैसे औजारों को पवित्र जल से धोकर साफ करते हैं। इसके बाद इन उपकरणों को फूलों की मालाओं (Flower Garlands) से सजाया जाता है। यह क्रिया इस विश्वास पर आधारित है कि ये औजार किसान के सबसे बड़े मित्र और शक्ति के स्रोत (Source of Power) हैं।
धार्मिक दृष्टि से इन औजारों को भगवान विश्वकर्मा (Lord Vishwakarma) का स्वरूप माना जाता है, जो सृजन के देवता हैं। पूजा के दौरान अगरबत्ती, दीप और फल अर्पित किए जाते हैं ताकि औजारों में दिव्य ऊर्जा (Divine Energy) का संचार हो सके। किसान प्रार्थना करते हैं कि काम के दौरान उन्हें किसी चोट या बाधा (Obstacles or Injuries) का सामना न करना पड़े। यह समर्पण भाव काम के प्रति श्रद्धा और कार्यस्थल की शुचिता (Purity of Workplace) को बढ़ावा देता है।
आजकल के आधुनिक युग में किसान अपने ट्रैक्टरों (Tractors) और कटाई मशीनों (Harvesting Machines) की भी इसी विधि से पूजा करते हैं। मशीनों पर स्वास्तिक (Swastika) का चिन्ह बनाया जाता है, जो शुभता और लाभ (Auspiciousness and Profit) का संकेत है। यह परंपरा पुरानी तकनीकों और नई मशीनरी के बीच एक संतुलन स्थापित करती है। यह हमें सिखाता है कि चाहे साधन बदल जाएँ, लेकिन उनके प्रति हमारा आदर भाव (Respectful Attitude) कभी नहीं बदलना चाहिए।
पूजा के अंत में औजारों पर हल्दी का पानी छिड़का जाता है, जो एंटीसेप्टिक (Antiseptic) गुणों के कारण उन्हें सुरक्षित रखता है। इसके बाद प्रसाद के रूप में नारियल और चने (Coconut and Grams) बांटे जाते हैं। यह अनुष्ठान परिवार के सभी सदस्यों की उपस्थिति में होता है, जिससे बच्चों को भी अपने पारिवारिक व्यवसाय (Family Business) के प्रति गर्व महसूस होता है। यह रस्म पीढ़ियों से चली आ रही एक समृद्ध विरासत (Rich Heritage) है।
इस प्रकार औजारों की वंदना करना केवल एक अंधविश्वास नहीं, बल्कि अपनी आजीविका (Livelihood) के प्रति गहरी कृतज्ञता व्यक्त करने का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक तरीका है। जब हम अपने काम करने के साधनों का सम्मान करते हैं, तो हमारे काम में निखार और सफलता (Success and Refinement) आती है। उझावर थिरुनाल की यह रस्म कर्म को ही पूजा (Work is Worship) मानने के दर्शन को जीवंत करती है। यह दिन वास्तव में श्रम की महत्ता का उत्सव है।