उरुका माघ बिहू की पूर्व संध्या होती है, जो पूरी तरह से उत्सव की तैयारी और सामाजिक मेलजोल (Social Interaction) के लिए समर्पित है। इस रात लोग अपने घरों के बजाय खुले मैदानों में बनी भेलाघर (Bhelaghar) में रुकते हैं। सामूहिक रूप से लकड़ियाँ इकट्ठा करना और रात के भोजन के लिए मछली पकड़ना (Catching Fish) एक रोमांचक अनुभव होता है। यह रात पुरानी कड़वाहट को भुलाकर नए रिश्ते बनाने और दोस्ती को गहरा (Deepening Friendships) करने का समय है।
मनोरंजन के लिए स्थानीय लोग 'बिहू गीत' और लोक संगीत (Bihu Songs and Folk Music) का आयोजन करते हैं। 'पेपा' (Pepa), जो भैंस के सींग से बना एक वाद्य यंत्र है, उसकी ध्वनि वातावरण में ऊर्जा भर देती है। लोग ढोल और ताल (Dhol and Taal) की थाप पर लोक नृत्य करते हैं। यह सामूहिक नृत्य और संगीत (Collective Dance and Music) असमिया समुदाय की धड़कन माना जाता है, जो हर उम्र के व्यक्ति को उल्लास से भर देता है।
उरुका की रात को साहसिक खेलों और पारंपरिक प्रतियोगिताओं का भी आयोजन किया जाता है। 'भैंसों की लड़ाई' (Buffalo Fight) और 'मुर्गों की लड़ाई' जैसे खेल पुराने समय से प्रचलित रहे हैं। हालांकि, अब इनमें कानूनी नियमों का पालन किया जाता है ताकि जानवरों को नुकसान न पहुँचे। ये खेल शारीरिक शक्ति और मनोरंजन (Physical Strength and Entertainment) का एक साधन होते हैं। गाँवों में इन आयोजनों को देखने के लिए हज़ारों की भीड़ उमड़ती है।
भोजन के दौरान 'उरुका भोज' (Uruka Feast) में सामुदायिक रसोई का दृश्य देखने लायक होता है। हर कोई अपनी क्षमता अनुसार अनाज, सब्जी या मछली का योगदान (Contribution) देता है। केले के पत्तों पर परोसा गया गरमा-गरम खाना एकता की भावना (Feeling of Unity) को मज़बूत करता है। रात भर अलाव जलाकर कहानियाँ सुनना और पुराने किस्से साझा करना इस रात को यादगार बना देता है। यह रात सामाजिक अखंडता (Social Integrity) का प्रतीक है।
आधुनिक समय में शहरों में भी लोग क्लबों या सामुदायिक केंद्रों में उरुका मनाते हैं। डिजिटल माध्यमों पर लाइव स्ट्रीमिंग (Live Streaming) के जरिए दूर बैठे लोगों को भी इस उत्सव से जोड़ा जाता है। उरुका का असली जादू उसके निस्वार्थ सेवा भाव और साझा खुशी (Shared Joy) में छिपा है। यह रात हमें सिखाती है कि खुशियाँ बाँटने से बढ़ती हैं। माघ बिहू की यह शुरुआत जोश और उमंग (Zest and Zeal) से भरी होती है।