भारतीय संविधान के भाग 3 में अनुच्छेद 12 से 35 तक मौलिक अधिकारों (Fundamental Rights) का वर्णन है। ये अधिकार प्रत्येक नागरिक को गरिमापूर्ण जीवन जीने की गारंटी देते हैं। इनमें समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार और शोषण के विरुद्ध अधिकार जैसे महत्वपूर्ण प्रावधान (Provisions) शामिल हैं।
अधिकारों के साथ-साथ नागरिकों की जिम्मेदारियों (Responsibilities) को स्पष्ट करने के लिए 42वें संशोधन के माध्यम से मौलिक कर्तव्यों (Fundamental Duties) को जोड़ा गया। ये कर्तव्य हमें याद दिलाते हैं कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ-साथ समाज और राष्ट्र के प्रति भी हमारे कुछ उत्तरदायित्व हैं।
संविधान निर्माताओं का मानना था कि बिना कर्तव्यों के अधिकार निरंकुश (Arbitrary) हो सकते हैं। इसलिए, अधिकारों का आनंद लेते समय हमें सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा और राष्ट्रीय ध्वज (National Flag) का सम्मान करने जैसे कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। यह संतुलन ही एक स्वस्थ लोकतंत्र की नींव है।
न्यायपालिका (Judiciary) इन अधिकारों की रक्षक के रूप में कार्य करती है। यदि किसी नागरिक के अधिकारों का हनन होता है, तो वह सीधे सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) का दरवाजा खटखटा सकता है। वहीं दूसरी ओर, कर्तव्य नागरिकों में देशभक्ति और अनुशासन (Discipline) की भावना पैदा करते हैं।
यह संतुलन सामाजिक समरसता (Social Harmony) बनाए रखने के लिए आवश्यक है। जब नागरिक अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होने के साथ-साथ अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन करते हैं, तो राष्ट्र का विकास तेजी से होता है। संविधान हमें एक जिम्मेदार नागरिक (Responsible Citizen) बनने की शिक्षा देता है।