डॉ. बी.आर. अंबेडकर संविधान की मसौदा समिति (Drafting Committee) के अध्यक्ष थे। उन्होंने विभिन्न देशों के संवैधानिक ढांचे का विश्लेषण किया और भारत की जटिल सामाजिक परिस्थितियों के अनुकूल एक विस्तृत मसौदा तैयार किया। उनके कानूनी ज्ञान (Legal Knowledge) और तर्कशक्ति ने संविधान को एक आधुनिक स्वरूप प्रदान किया।
अंबेडकर जी ने समाज के वंचित वर्गों (Underprivileged Sections) के अधिकारों के लिए कड़ा संघर्ष किया। उन्होंने सुनिश्चित किया कि संविधान में छुआछूत जैसी सामाजिक बुराइयों के उन्मूलन और आरक्षण (Reservation) जैसे सुरक्षात्मक प्रावधानों को शामिल किया जाए। उनके प्रयासों से ही दलितों और पिछड़ों को समाज में बराबरी का स्थान मिला।
वह संसदीय लोकतंत्र (Parliamentary Democracy) के प्रबल समर्थक थे और उन्होंने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के बीच एक सेतु बनाने का काम किया। उनके भाषणों और तर्कों ने संविधान सभा के अन्य सदस्यों को प्रभावित किया और विवादित मुद्दों पर आम सहमति (Consensus) बनाने में मदद की।
संविधान के अंतिम रूप में उनकी छाप स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, विशेषकर राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों (Directive Principles) में। उन्होंने शासन को केवल सत्ता का साधन नहीं बल्कि लोक कल्याण (Public Welfare) का माध्यम माना। इसी दूरगामी सोच के कारण उन्हें आधुनिक मनु की संज्ञा भी दी जाती है।
भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था (Democratic System) आज जिस मजबूती के साथ खड़ी है, उसका बहुत बड़ा श्रेय अंबेडकर जी के विजन को जाता है। उन्होंने एक ऐसा लचीला (Flexible) संविधान दिया जिसमें समय के अनुसार बदलाव किए जा सकते हैं। उनके योगदान के बिना भारतीय लोकतंत्र की कल्पना करना असंभव है।