भारतीय थल सेना (Indian Army) के बेड़े में अर्जुन (Arjun) टैंक स्वदेशी तकनीक का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसे रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) द्वारा विकसित किया गया है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसका हंटर-किलर (Hunter-Killer) सिस्टम है, जो इसे गतिशील लक्ष्यों को सटीकता से भेदने में सक्षम बनाता है। अर्जुन टैंक में 120 मिमी (120mm) की राइफल्ड गन लगी होती है, जो उच्च विस्फोटक (High Explosive) गोलों का उपयोग करती है।
वहीं दूसरी ओर, टी-90 भीष्म (T-90 Bhishma) टैंक रूसी मूल का है जिसे भारत में लाइसेंस के तहत बनाया जाता है। यह टैंक अपने कम वजन और तेज गति (High Speed) के लिए जाना जाता है, जो इसे रेगिस्तानी इलाकों में बहुत प्रभावी बनाता है। भीष्म में 125 मिमी (125mm) की स्मूथबोर गन होती है जो मिसाइल दागने (Missile Firing) की क्षमता भी रखती है। सुरक्षा के लिहाज से इसमें कंचन कवच (Kanchan Armour) और सक्रिय सुरक्षा प्रणालियाँ लगी होती हैं।
दोनों टैंकों की परिचालन भूमिकाएँ (Operational Roles) अलग-अलग हैं, जहाँ अर्जुन अपनी भारी सुरक्षा और कवच (Armour) के लिए जाना जाता है, वहीं भीष्म अपनी चपलता के लिए प्रसिद्ध है। अर्जुन टैंक में एक आधुनिक थर्मल इमेजर (Thermal Imager) लगा होता है जो रात के अंधेरे में भी दुश्मन को खोजने में मदद करता है। टी-90 भीष्म का लेजर गाइडेड सिस्टम (Laser Guided System) लंबी दूरी से ही टैंक भेदी मिसाइलें दागने में माहिर है।
इन युद्धक वाहनों का रखरखाव और रसद (Logistics) प्रबंधन सेना की अलग-अलग कोर द्वारा किया जाता है। रेगिस्तानी युद्ध (Desert Warfare) के दौरान भीष्म की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि यह अत्यधिक तापमान में भी बेहतरीन प्रदर्शन करता है। अर्जुन मार्क 1ए (Arjun Mk 1A) जैसे नए संस्करणों ने अब स्वदेशी रडार और संचार प्रणालियों (Communication Systems) के साथ अपनी मारक क्षमता को और अधिक बढ़ा लिया है।
भारतीय रक्षा प्रदर्शनी (Defense Expo) के दौरान इन दोनों महाबली टैंकों का प्रदर्शन जनता के आकर्षण का केंद्र रहता है। सेना इन टैंकों के माध्यम से अपनी आक्रामक शक्ति (Offensive Power) और तकनीकी श्रेष्ठता का परिचय देती है। ये टैंक न केवल सीमाओं की रक्षा करते हैं बल्कि दुश्मन के मन में मनोवैज्ञानिक दबाव (Psychological Pressure) भी पैदा करते हैं।