असम, मेघालय और मणिपुर जैसे पूर्वोत्तर राज्यों की झांकियां अपनी अनूठी जनजातीय संस्कृति (Tribal Culture) और प्रकृति के प्रति प्रेम के लिए प्रसिद्ध हैं। इन झांकियों में अक्सर बांस और बेंत (Bamboo and Cane) से बनी वस्तुओं का व्यापक उपयोग किया जाता है, जो उनकी आत्मनिर्भरता और कलात्मकता को दर्शाता है। यह हस्तशिल्प न केवल सुंदर है बल्कि पर्यावरण के अनुकूल (Eco-friendly) भी है।
वन्यजीव संरक्षण (Wildlife Conservation) इन राज्यों की झांकियों का एक अनिवार्य हिस्सा होता है, जैसे असम की झांकी में एक सींग वाला गेंडा (One-horned Rhino) दिखाना। इन विषयों के माध्यम से पूर्वोत्तर राज्य अपनी समृद्ध जैव विविधता (Biodiversity) और विलुप्तप्राय प्रजातियों की सुरक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जाहिर करते हैं। यह संदेश वैश्विक जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के दौर में अत्यंत प्रासंगिक है।
पूर्वोत्तर की झांकियों में सामुदायिक उत्सवों और फसल कटाई के त्योहारों जैसे 'बिहू' को बहुत ही उत्साह के साथ दिखाया जाता है। इन झांकियों के साथ चलने वाले कलाकार अपने पारंपरिक वाद्य यंत्रों और गीतों के माध्यम से एक अलग ही माहौल बना देते हैं। उनकी सामूहिक नृत्य (Group Dance) शैली एकता और भाईचारे का एक सशक्त उदाहरण पेश करती है।
मणिपुर की झांकी में अक्सर 'रासलीला' या मार्शल आर्ट 'थांग-टा' (Thang-Ta) का प्रदर्शन किया जाता है, जो उनकी वीरता और कलात्मकता का संगम है। मेघालय अपनी झांकी में अक्सर 'लिविंग रूट ब्रिज' (Living Root Bridges) जैसे इंजीनियरिंग के चमत्कारों को दिखाता है, जो प्रकृति और मानव के सहयोग का प्रतीक हैं। ये विषय दुनिया को यह सिखाते हैं कि प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर कैसे रहा जा सकता है।
इन राज्यों की झांकियां अक्सर अपने छोटे आकार के बावजूद अपने गहरे अर्थ और जटिल डिजाइन (Intricate Design) के लिए सराही जाती हैं। पूर्वोत्तर भारत की झांकियां देश के इस हिस्से को मुख्यधारा से जोड़ने और वहां के पर्यटन (Tourism) को बढ़ावा देने का एक महत्वपूर्ण माध्यम हैं। यह मंच उन्हें अपनी विशिष्ट पहचान और 'अष्टलक्ष्मी' के रूप में अपनी भूमिका को दुनिया के सामने रखने का अवसर देता है।