26 जनवरी 1950 को जब भारत का संविधान लागू हुआ और हम एक गणराज्य (Republic) बने, तब इंडोनेशिया के तत्कालीन राष्ट्रपति सुकर्णो (President Sukarno) हमारे पहले मुख्य अतिथि थे। मुख्य अतिथि को बुलाने की यह परंपरा अंतरराष्ट्रीय संबंधों (International Relations) और कूटनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। सुकर्णो का आगमन उस समय एशियाई एकजुटता और उपनिवेशवाद (Colonialism) के खिलाफ संघर्ष का एक बड़ा संदेश था।
सुकर्णो के चयन के पीछे भारत की 'गुटनिरपेक्ष नीति' (Non-Alignment Policy) और पड़ोसी देशों के साथ मजबूत संबंधों की इच्छा थी। भारत और इंडोनेशिया दोनों ने ही लंबे संघर्ष के बाद अपनी आजादी हासिल की थी, इसलिए उनके बीच एक स्वाभाविक सहानुभूति और मित्रता (Friendship) थी। इस ऐतिहासिक यात्रा ने दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत के सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रभाव (Political Influence) को स्थापित करने में मदद की।
मुख्य अतिथि के रूप में सुकर्णो की उपस्थिति ने यह सिद्ध किया कि भारत अब विश्व राजनीति में एक स्वतंत्र खिलाड़ी के रूप में उभर चुका है। परेड के दौरान उनका स्वागत 31 तोपों की सलामी के साथ किया गया था, जो उस समय के प्रोटोकॉल (Protocol) के अनुसार था। उनकी यात्रा के दौरान कई सांस्कृतिक और व्यापारिक उत्पादों (Products) के आदान-प्रदान पर चर्चा हुई जिससे भविष्य के द्विपक्षीय सहयोग का मार्ग प्रशस्त हुआ।
आज भी मुख्य अतिथि को आमंत्रित करना भारत की विदेश नीति (Foreign Policy) का एक रणनीतिक हिस्सा माना जाता है। हम अक्सर उन देशों के राष्ट्राध्यक्षों को बुलाते हैं जिनके साथ हमारे रक्षा (Defense) और आर्थिक संबंध सबसे अधिक प्रगाढ़ होते हैं। सुकर्णो से शुरू हुई यह कड़ी आज भी जारी है और हर साल एक नए देश के साथ हमारे रिश्तों को नई ऊँचाई पर ले जाती है। यह परंपरा वैश्विक भाईचारे और शांति के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
मुख्य अतिथि की उपस्थिति परेड को एक अंतरराष्ट्रीय मंच (International Platform) प्रदान करती है, जहाँ भारत अपनी सैन्य शक्ति और सांस्कृतिक विरासत का प्रदर्शन करता है। यह अवसर भारत की 'सॉफ्ट पावर' (Soft Power) को दुनिया के सामने रखने का सबसे अच्छा समय होता है। सुकर्णो का वह पहला दौरा आज भी भारतीय कूटनीति के इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है जिसने एक नई गौरवशाली परंपरा की नींव रखी।