गुरु रविदास जी के पदों में परमात्मा को 'निर्गुण' (Formless) और निराकार सत्ता के रूप में देखा गया है, जो किसी सीमा में नहीं बंधा है। उन्होंने ईश्वर को 'अविनाशी' (Immortal) कहा है, जिसका न कोई आदि है और न ही कोई अंत। उनकी वाणी के अनुसार, परमात्मा किसी विशेष मंदिर या मूर्ति (Statue) में नहीं, बल्कि संपूर्ण सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है। यह विचारधारा मनुष्य को बाहरी आडंबरों (External Rituals) से हटाकर आंतरिक खोज (Internal Search) की ओर प्रेरित करती है।
परमात्मा का स्वरूप उनकी वाणी में अत्यंत दयालु और न्यायकारी (Just) बताया गया है, जो अपने भक्तों के कुल या वर्ग को नहीं देखता। गुरु जी ने ईश्वर को 'गरीब निवाजु' (Protector of Poor) कहकर पुकारा है, जो असहायों का सहारा बनता है। उनकी भक्ति में एक प्रकार की सहजता (Simplicity) है, जहाँ भक्त और भगवान के बीच कोई मध्यस्थ या पुजारी नहीं होता। परमात्मा के प्रति यह सीधा संवाद भक्त के आत्मविश्वास (Self-confidence) को अटूट बनाता है।
निर्गुण भक्ति (Formless Devotion) के इन पदों में आत्मा को परमात्मा का ही एक अंश माना गया है, जैसे जल की बूंद समुद्र का हिस्सा होती है। गुरु रविदास जी ने समझाया है कि अज्ञानता (Ignorance) के कारण ही हम खुद को ईश्वर से अलग समझते हैं। जैसे ही ज्ञान का दीपक जलता है, यह द्वैत भाव समाप्त हो जाता है और भक्त उस परम ज्योति (Supreme Light) में विलीन हो जाता है। उनकी वाणी इस मिलन की तड़प और आनंद का जीवंत चित्रण प्रस्तुत करती है।
गुरु जी ने परमात्मा को 'सत्तनाम' (Satnam) के रूप में पहचाना है, जिसका अर्थ है वह सत्य नाम जो शाश्वत है। उन्होंने मूर्ति पूजा और बाहरी कर्मकांडों (Formalities) के बजाय मन की पवित्रता पर जोर दिया। उनके अनुसार, यदि हृदय मैला है तो गंगा स्नान भी निरर्थक है। यह दर्शन व्यक्ति को नैतिक मूल्यों (Ethical Values) पर आधारित जीवन जीने के लिए प्रोत्साहित करता है। परमात्मा का ऐसा व्यापक वर्णन संकीर्णता की बेड़ियों को तोड़ने में सहायक होता है।
परमात्मा के इस विराट स्वरूप को समझने के लिए गुरु रविदास जी ने गुरु की महत्ता (Importance of Guru) को भी स्वीकार किया है। बिना गुरु के मार्गदर्शन के निराकार ईश्वर का साक्षात्कार असंभव है। उनकी वाणी आज भी हमें एक ऐसी शक्ति से जोड़ती है जो ब्रह्मांड का आधार (Foundation of Universe) है। परमात्मा के प्रति यह अटूट विश्वास ही मनुष्य को दुनिया के झंझावातों में स्थिर रखता है। निर्गुण भक्ति का यह मार्ग वास्तव में आत्म-कल्याण (Self-welfare) का सबसे सरल रास्ता है।