इस दोहे में संत रविदास जी ने ईश्वर के नाम को 'हीरा' (Diamond) और संसार की मोह-माया को 'कांच' (Glass) के समान बताया है। वे कहते हैं कि जो लोग प्रभु की वास्तविक भक्ति को छोड़कर सांसारिक सुखों (Worldly Pleasures) के पीछे भागते हैं, वे उस मूर्ख व्यक्ति की तरह हैं जो असली रत्न को फेंककर कांच के टुकड़ों को बटोर रहा है। यह दोहा हमें जीवन की प्राथमिकताओं (Life Priorities) को सही ढंग से चुनने की चेतावनी देता है।
संसार नश्वर (Mortal) है और यहाँ की सभी वस्तुएं एक न एक दिन समाप्त हो जाएंगी, लेकिन ईश्वर का प्रेम और नाम अविनाशी (Eternal) है। मनुष्य अक्सर लोभ और अहंकार (Greed and Ego) के वश में होकर जीवन के असली उद्देश्य को भूल जाता है। रविदास जी की वाणी हमें सजग करती है कि हम जिस माया को पकड़ने की कोशिश कर रहे हैं, वह केवल एक भ्रम (Illusion) है। असली धन तो वह राम-नाम है जो मृत्यु के बाद भी साथ रहता है।
भक्ति का अर्थ संसार को छोड़ना नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए ईश्वर को न भूलना है। जैसे हीरा अत्यंत कठोर और मूल्यवान (Valuable) होता है, वैसे ही दृढ़ विश्वास और भक्ति भी मनुष्य के चरित्र को अटूट बनाती है। कांच की चमक क्षणिक होती है और वह जल्दी टूट जाता है, ठीक उसी तरह सांसारिक सुख (Sensual Pleasures) भी दुख में बदल जाते हैं। यह तुलना बहुत ही सरल तरीके से वैराग्य और भक्ति (Detachment and Devotion) का महत्व समझाती है।
गुरु जी ने इस दोहे में विवेक (Wisdom) के उपयोग पर जोर दिया है। हम अपनी इंद्रियों के वश में होकर अक्सर गलत निर्णय लेते हैं। आध्यात्मिक मार्ग (Spiritual Path) पर चलने के लिए मन का स्थिर होना और सत्य की परख होना अनिवार्य है। प्रभु का नाम वह प्रकाश है जो अज्ञानता के अंधकार (Darkness of Ignorance) को मिटा देता है। यह दोहा हमें आत्मिक शांति और शाश्वत आनंद की ओर ले जाने वाला एक मार्गदर्शक (Guide) है।
आज के उपभोक्तावादी दौर (Consumerist Era) में जहाँ इंसान केवल भौतिक संपत्ति (Material Assets) के पीछे भाग रहा है, वहाँ यह दोहा बहुत बड़ी सीख देता है। यह हमें याद दिलाता है कि असली सुख शांति में है, संग्रह में नहीं। रविदास जी के विचार हमें संतुलित जीवन (Balanced Life) जीने की कला सिखाते हैं। हीरे जैसी बहुमूल्य भक्ति को अपने जीवन का हिस्सा बनाकर ही हम जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो सकते हैं।