संत रविदास जी के समस्त साहित्य और दोहों का केंद्र बिंदु मानवता (Humanity) और परोपकार है। वे कहते हैं कि वही व्यक्ति वास्तव में धार्मिक है जो दूसरों के दुख को अपना समझता है और उसे दूर करने का प्रयास करता है। उनके लिए परोपकार (Altruism) से बढ़कर कोई दूसरा पुण्य नहीं है। उन्होंने अपने जीवन के आचरण से यह सिखाया कि सेवा ही ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ सेवा है।
उनके दोहों में 'दया' को धर्म का मूल माना गया है। यदि हमारे हृदय में किसी पीड़ित के प्रति सहानुभूति (Sympathy) नहीं है, तो हमारी पूजा और माला जपना सब निष्फल है। रविदास जी ने समाज के वंचित वर्गों की सेवा को अपना मिशन (Mission) बनाया। उन्होंने सिखाया कि भूखे को भोजन कराना और दुखी को सहारा देना ही वास्तविक आध्यात्मिकता (True Spirituality) है। उनके विचारों में वैश्विक भाईचारे (Global Brotherhood) की गूँज सुनाई देती है।
मानवतावाद (Humanism) का अर्थ है मनुष्य को मनुष्य समझना, न कि उसे धर्म या संप्रदाय के चश्मे से देखना। गुरु जी ने प्रेम को ही सबसे बड़ा शास्त्र माना। उन्होंने तर्क दिया कि जब ईश्वर अपनी कृपा सभी पर समान रूप से बरसाता है, तो मनुष्य को भी भेदभाव (Discrimination) त्याग कर सबका भला सोचना चाहिए। यह उदारवादी सोच (Liberal Thinking) ही रविदास जी को एक महान समाज सुधारक और संत बनाती है।
सेवा करते समय अहंकार का न होना (Egoless Service) भी उनकी एक महत्वपूर्ण शिक्षा है। वे कहते थे कि जो सेवा 'दिखावे' के लिए की जाती है, उसका कोई फल नहीं मिलता। सच्ची सेवा वही है जो गुप्त रूप से और निस्वार्थ भाव (Selfless Spirit) से की जाए। उन्होंने अपने दोहों के जरिए समाज को एक सूत्र में पिरोने का काम किया। उनकी वाणी आज भी सामाजिक एकता और सौहार्द (Social Unity and Harmony) का सबसे बड़ा स्रोत है।
वर्तमान युग में बढ़ती नफरत और संकीर्णता के बीच रविदास जी के 'परहित' के विचार अत्यंत आवश्यक हैं। यह हमें सिखाते हैं कि हम अपनी व्यक्तिगत उन्नति (Personal Growth) के साथ-साथ समाज के उत्थान के बारे में भी सोचें। दूसरों के आँसू पोंछना ही सबसे बड़ी इबादत है। गुरु रविदास जी के दोहे मानवता के कल्याण (Welfare of Mankind) के लिए एक शाश्वत घोषणापत्र (Eternal Manifesto) की तरह हैं।