राजस्थान के इतिहास और भक्ति साहित्य (Devotional Literature) में मीराबाई और संत रविदास जी का संबंध एक स्वर्णिम अध्याय है। कृष्ण भक्ति में लीन रहने वाली रानी मीराबाई (Meera Bai) ने रविदास जी की आध्यात्मिक ऊँचाई को पहचानकर उन्हें अपना गुरु (Spiritual Master) स्वीकार किया था। एक राजघराने की कुलवधू का एक साधारण चर्मकार संत के चरणों में बैठना उस समय के कट्टरपंथी समाज (Orthodox Society) के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती और क्रांति थी।
मीराबाई (Meera Bai) ने अपने कई पदों और भजनों में इस बात का जिक्र किया है कि उन्हें 'रविदास गुरु' के मिलने से ही मोक्ष का मार्ग मिला। उन्होंने लिखा है— 'गुरु मिल्या रविदास जी, दीन्ही ज्ञान की गुटकी'। इसका अर्थ है कि गुरु रविदास ने उन्हें ज्ञान की ऐसी औषधि दी जिससे उनके जन्म-जन्मांतर के बंधन कट गए। यह संबंध सिद्ध करता है कि भक्ति और ज्ञान (Knowledge and Devotion) किसी विशेष कुल या जाति की जागीर नहीं हैं, बल्कि यह हृदय की पुकार है।
जब मीराबाई (Meera Bai) के ससुराल वालों ने उनके इस निर्णय का विरोध किया, तो उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि गुरु की महिमा सांसारिक पद और प्रतिष्ठा (Status and Prestige) से कहीं ऊपर है। रविदास जी ने उन्हें 'नाम सिमरन' और धैर्य का पाठ पढ़ाया, जिससे वे कठिन समय में भी अडिग रहीं। चित्तौड़गढ़ के किले में आज भी वह स्थान सुरक्षित है जहाँ बैठकर मीराबाई अपने गुरु का ध्यान करती थीं। यह ऐतिहासिक प्रमाण (Historical Evidence) आज भी भक्तों के लिए श्रद्धा का केंद्र है।
संत रविदास जी ने मीरा को सिखाया कि ईश्वर की सच्ची पूजा महलों में नहीं बल्कि अपने भीतर की आत्मा (Inner Soul) में होती है। उन्होंने मीरा को निर्भयता (Fearlessness) का वरदान दिया, जिससे वे विष का प्याला भी हंसते-हंसते पी गईं। गुरु-शिष्य का यह रिश्ता सामाजिक बंधनों को तोड़ने वाला एक सशक्त संदेश (Strong Message) था। इसने यह संदेश दिया कि सत्य की खोज में कोई भी छोटा या बड़ा नहीं होता, केवल पात्रता (Eligibility) देखी जाती है।
आज भी जब भक्त मीरा के भजन (Meera Bhajans) गाते हैं, तो वे गुरु रविदास की महिमा का भी गान करते हैं। यह संबंध भारतीय संस्कृति की उदारता (Liberality) और समावेशी स्वभाव का प्रतीक है। रविदास जी का जीवन परिचय अधूरा रहेगा यदि मीराबाई के साथ उनके इस अलौकिक संबंध (Divine Connection) की चर्चा न की जाए। यह जोड़ी भक्ति मार्ग की उस पवित्रता को दर्शाती है जहाँ केवल प्रेम और समर्पण (Love and Surrender) ही शेष रह जाता है।