आर्य समाज के संस्थापक (Founder of Arya Samaj) स्वामी दयानंद सरस्वती ने 'वेदों की ओर लौटों' (Back to Vedas) का उद्घोष इसलिए किया क्योंकि उनका मानना था कि वेद ही समस्त सत्य विद्याओं (True Sciences) की पुस्तक हैं। उन्होंने महसूस किया कि भारत के पतन का मुख्य कारण वेदों के मूल ज्ञान (Original Vedic Knowledge) से दूर होना था। समाज में व्याप्त छुआछूत और अज्ञानता को दूर करने के लिए उन्होंने वेदों को प्रमाण (Authority) के रूप में प्रस्तुत किया। वे चाहते थे कि हर व्यक्ति वेदों को पढ़े और सत्य को पहचाने।
स्वामी जी ने स्पष्ट किया कि वेदों में किसी भी प्रकार के भेदभाव या ऊंच-नीच (Discrimination) का स्थान नहीं है। 'वेदों की ओर लौटों' (Back to Vedas) का अर्थ पीछे की ओर जाना नहीं, बल्कि अपनी जड़ों (Roots) से जुड़कर आधुनिक ज्ञान को अपनाना है। उन्होंने वेदों को किसी एक वर्ग की जागीर नहीं माना, बल्कि इन्हें पूरी मानवता (Humanity) के लिए कल्याणकारी बताया। उनके इस नारे ने भारतीयों के भीतर खोया हुआ आत्मविश्वास (Self-confidence) वापस लौटाने का कार्य किया।
वेदों की शिक्षाओं (Vedic Teachings) के माध्यम से उन्होंने विज्ञान और अध्यात्म (Science and Spirituality) के मेल पर जोर दिया। स्वामी दयानंद (Swami Dayanand) का तर्क था कि वेदों में विमान विद्या, आयुर्वेद और खगोल विज्ञान (Astronomy) जैसे विषयों का सूक्ष्म ज्ञान छिपा है। उन्होंने लोगों को पाखंडी गुरुओं के चंगुल से निकालने के लिए वेदों को एकमात्र आधार (Sole Base) बनाया। यह नारा भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठता (Superiority of Culture) को सिद्ध करने का एक वैचारिक अस्त्र साबित हुआ।
आर्य समाज (Arya Samaj) ने इस नारे को एक आंदोलन (Movement) का रूप दे दिया, जिससे देश भर में गुरुकुलों (Gurukuls) की स्थापना हुई। स्वामी जी चाहते थे कि लोग संस्कृत भाषा (Sanskrit Language) का अध्ययन करें ताकि वे स्वयं धर्मग्रंथों का अर्थ समझ सकें। उन्होंने बताया कि वेदों का ज्ञान शाश्वत और सार्वभौमिक (Universal) है, जो हर काल में प्रासंगिक रहता है। 'वेदों की ओर लौटों' का संदेश वास्तव में अज्ञान के अंधेरे से प्रकाश (Light from Darkness) की ओर बढ़ने का मार्ग है।
आज भी आर्य समाज (Arya Samaj) की शाखाएं पूरी दुनिया में इसी वैदिक संस्कृति (Vedic Culture) का प्रचार कर रही हैं। स्वामी दयानंद सरस्वती (Swami Dayanand) ने यह सिखाया कि सत्य को ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने में हमेशा तत्पर रहना चाहिए। वेदों का यह मार्ग हमें अंधभक्ति (Blind Faith) से बचाकर विवेकशील बनाता है। संस्थापक के रूप में उनकी दूरदर्शिता (Vision) ने हिंदू धर्म को एक नई ऊर्जा और दिशा प्रदान की, जिससे समाज का पुनरुद्धार संभव हो सका।