एक महान समाज सुधारक (Social Reformer) के रूप में दयानंद सरस्वती ने भारतीय समाज की जर्जर अवस्था को सुधारने के लिए क्रांतिकारी कदम उठाए। उन्होंने बाल विवाह (Child Marriage) जैसी कुप्रथा का कड़ा विरोध किया और इसे शारीरिक एवं मानसिक विकास में सबसे बड़ी बाधा बताया। स्वामी जी का मानना था कि जब तक समाज से अंधविश्वास (Blind Faith) खत्म नहीं होगा, तब तक देश की उन्नति संभव नहीं है। उन्होंने छुआछूत (Untouchability) को वेदों के विरुद्ध बताया और समाज के हर वर्ग को समानता (Equality) का अधिकार देने की वकालत की।
स्वामी दयानंद सरस्वती (Swami Dayanand Saraswati) ने विधवाओं की दयनीय स्थिति को सुधारने के लिए विधवा विवाह (Widow Remarriage) का पुरजोर समर्थन किया। उन्होंने समाज के ठेकेदारों और कट्टरपंथियों (Orthodox People) को शास्त्रार्थ (Debate) में पराजित किया और यह सिद्ध किया कि शास्त्रों में महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त हैं। उनके प्रयासों से समाज में स्त्रियों के प्रति दृष्टिकोण (Perspective towards Women) बदलने लगा। उन्होंने जाति प्रथा (Caste System) के जन्म आधारित स्वरूप को नकार कर कर्म आधारित व्यवस्था पर जोर दिया।
धार्मिक पाखंडों (Religious Hypocrisy) को समाप्त करने के लिए उन्होंने 'पाखंड खंडिनी पताका' (Flag to denounce Hypocrisy) फहराई। उन्होंने गंगा के तट पर बैठकर पुरोहितों को चुनौती दी और वेदों की वास्तविक व्याख्या (Interpretation of Vedas) प्रस्तुत की। समाज सुधारक दयानंद (Social Reformer Dayanand) का मुख्य उद्देश्य एक ऐसे समाज का निर्माण करना था जो विवेकशील और तर्कसंगत (Rational) हो। उन्होंने लोगों को पाखंडी गुरुओं के चंगुल से निकालकर आत्मनिर्भर (Self-reliant) बनने की शिक्षा दी।
आर्य समाज (Arya Samaj) की स्थापना के माध्यम से उन्होंने अपने सुधार आंदोलनों (Reform Movements) को एक संगठित स्वरूप दिया। इस संस्था ने शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा (Social Service) के क्षेत्रों में अभूतपूर्व कार्य किए। स्वामी जी ने 'शुद्धि आंदोलन' (Shuddhi Movement) की शुरुआत की ताकि जो लोग किन्हीं कारणों से अपना धर्म छोड़ चुके थे, वे सम्मानपूर्वक वापस आ सकें। उनके इन सुधारवादी कार्यों ने हिंदू धर्म (Hinduism) को एक नई ऊर्जा और आधुनिक सोच प्रदान की।
समाज सुधारक दयानंद (Social Reformer Dayanand) ने न केवल बुराइयों को गिनाया, बल्कि उनके समाधान (Solutions) भी दिए। उन्होंने 'स्वदेशी' (Indigenous) वस्तुओं के उपयोग और हिंदी भाषा के प्रचार पर बल दिया ताकि देश की एकता (National Unity) मजबूत हो सके। उनकी शिक्षाएं आज भी हमें जातिवाद और संकीर्णता (Narrow-mindedness) से ऊपर उठकर मानवता की सेवा (Service to Humanity) करने के लिए प्रेरित करती हैं। उनका योगदान आधुनिक भारत के निर्माण में एक मील का पत्थर (Milestone) है।