शिव तांडव स्तोत्र (Shiv Tandav Stotra) की रचना महान भक्त और प्रकांड विद्वान रावण (Ravana) ने की थी, जब वह महादेव की स्तुति में लीन था। यह स्तोत्र अपनी लयबद्ध शब्दावली और वीर रस (Heroic Sentiment) के लिए जाना जाता है, जो शिव के नृत्य और उनके प्रचंड स्वरूप का वर्णन करता है। इसका पाठ करने से भक्त के भीतर छिपी हुई शक्तियां जाग्रत होती हैं और आत्मविश्वास (Self-confidence) में अपार वृद्धि होती है। यह स्तोत्र शक्ति और भक्ति का एक अद्भुत संगम है।
शिव तांडव स्तोत्र (Shiv Tandav Stotra) का पाठ करने के लिए शांत वातावरण (Quiet Environment) और शुद्ध मन का होना आवश्यक है। इसे प्रातः काल या संध्या के समय पढ़ना सबसे प्रभावशाली रहता है। पाठ करते समय उच्चारण (Pronunciation) की शुद्धता पर विशेष ध्यान देना चाहिए क्योंकि इसके शब्दों में तीव्र ऊर्जा (Intense Energy) समाहित होती है। यदि आप पूरा स्तोत्र नहीं पढ़ सकते, तो इसे सुनना भी उतना ही लाभकारी माना गया है।
नियमित पाठ करने से वाक्-सिद्धि और बौद्धिक क्षमता (Intellectual Capacity) का विकास होता है। शिव तांडव स्तोत्र (Shiv Tandav Stotra) के प्रभाव से मनुष्य के जीवन में आ रही बड़ी से बड़ी बाधाएं दूर हो जाती हैं। यह स्तोत्र नकारात्मक शक्तियों और ऊपरी बाधाओं से रक्षा करने वाला एक अचूक मंत्र (Infallible Mantra) है। कला, संगीत और अभिनय (Acting) के क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए यह स्तोत्र विशेष रूप से वरदान साबित होता है क्योंकि शिव स्वयं नटराज (Nataraja) हैं।
शिव तांडव स्तोत्र (Shiv Tandav Stotra) के पाठ से एकाग्रता बढ़ती है और मन की चंचलता समाप्त होती है। यह स्तोत्र भक्त को निर्भय बनाता है और उसे नेतृत्व करने की शक्ति (Power to Lead) प्रदान करता है। रावण ने इसे तब रचा था जब उसका अहंकार चूर हो गया था, इसलिए यह हमें विनम्रता और समर्पण की भी सीख देता है। इसके प्रत्येक श्लोक में भगवान शिव के दिव्य स्वरूप की महिमा (Glory) गाई गई है, जो श्रोता को सम्मोहित कर लेती है।
अंतिम रूप से यह स्तोत्र केवल एक काव्य नहीं, बल्कि महादेव को प्रसन्न करने का एक तीव्र माध्यम है। शिव तांडव स्तोत्र (Shiv Tandav Stotra) का नियमित श्रवण कुंडली के दोषों को दूर कर जीवन में सफलता के मार्ग प्रशस्त करता है। इसे पूरी लय और ताल के साथ पढ़ना एक प्रकार का मानसिक योग (Mental Yoga) है। भोलेनाथ के भक्त इस स्तोत्र के माध्यम से अपनी भक्ति को चरम सीमा पर ले जाते हैं, जिससे उन्हें परमानंद (Supreme Bliss) की प्राप्ति होती है।