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छत्रपति शिवाजी महाराज को भारतीय नौसेना का जनक (Father of Indian Navy) माना जाता है क्योंकि उन्होंने पहली बार समुद्री सीमाओं की रक्षा के महत्व को पहचाना। उन्होंने देखा कि पुर्तगाली, डच और अंग्रेज व्यापारी बनकर आ रहे हैं लेकिन धीरे-धीरे समुद्री मार्गों पर कब्जा कर रहे हैं। इस चुनौती से निपटने के लिए उन्होंने कोंकण तट पर अपने स्वयं के जहाज बनाने के कारखाने (Shipyards) स्थापित किए। उनकी नौसेना नीति (Navy Policy) का उद्देश्य विदेशी शक्तियों के व्यापारिक एकाधिकार को तोड़ना था।

महाराज के बेड़े में 'गुराब', 'गैलिवेट' और 'पाल' जैसे विभिन्न प्रकार के युद्धपोत (Warships) शामिल थे। ये जहाज आकार में छोटे और बहुत तेज (Fast) थे, जिससे वे उथले पानी और संकरी खाड़ियों में आसानी से आवाजाही कर सकते थे। बड़े विदेशी जहाजों के लिए इन छोटे मराठा जहाजों का पीछा करना कठिन होता था। शिवाजी महाराज की नौसेना नीति (Navy Policy) में स्वदेशी तकनीकों (Indigenous Technologies) का उपयोग किया गया था जो भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल थीं।

समुद्री सुरक्षा के लिए उन्होंने खांडेरी, कुलाबा और सुवर्णदुर्ग जैसे किलों को अभेद्य बनाया। इन समुद्री अड्डों (Naval Bases) से मराठा नौसेना दुश्मन के जहाजों पर नजर रखती थी और उनसे 'दस्तक' (Trade Permit) वसूलती थी। कान्होजी आंग्रे जैसे कुशल नौसैनिक कमांडरों ने बाद में इसी नीति को आगे बढ़ाया। शिवाजी महाराज की नौसेना नीति (Navy Policy) ने यह सुनिश्चित किया कि भारत के पश्चिमी तट पर कोई भी बाहरी शक्ति बिना अनुमति के व्यापार न कर सके।

नौसेना के सैनिकों का प्रशिक्षण (Training) बहुत कठोर होता था और उन्हें समुद्र की लहरों और मौसम के बदलावों को समझने की कला सिखाई जाती थी। महाराज ने स्थानीय मछुआरों और कोली समुदाय के लोगों को अपनी नौसेना में भर्ती किया क्योंकि वे समुद्र के मिजाज (Nature of Sea) को सबसे बेहतर जानते थे। यह एक समावेशी सेना थी जहाँ कौशल (Skill) को जाति से ऊपर रखा गया था। उन्होंने समुद्री डाकुओं पर भी प्रभावी ढंग से नियंत्रण पाया।

शिवाजी महाराज की नौसेना नीति (Navy Policy) केवल युद्ध तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसमें समुद्री व्यापार (Maritime Trade) के विकास की भी सोच थी। उन्होंने अपने जहाजों का उपयोग माल ढोने और राजस्व (Revenue) बढ़ाने के लिए भी किया। उनकी दूरदर्शिता ने भारत को एक समुद्री शक्ति (Naval Power) के रूप में पुनर्जीवित किया। आज की भारतीय नौसेना भी महाराज के उन्हीं सिद्धांतों और प्रतीकों से प्रेरणा लेती है, जो राष्ट्र की अखंडता की रक्षा का आधार हैं।

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छत्रपति शिवाजी महाराज को भारतीय नौसेना का जनक (Father of Indian Navy) माना जाता है क्योंकि उन्होंने पहली बार समुद्री सीमाओं की रक्षा के महत्व को पहचाना। उन्होंने देखा कि पुर्तगाली, डच और अंग्रेज व्यापारी बनकर आ रहे हैं लेकिन धीरे-धीरे समुद्री मार्गों पर कब्जा कर रहे हैं। इस चुनौती से निपटने के लिए उन्होंने कोंकण तट पर अपने स्वयं के जहाज बनाने के कारखाने (Shipyards) स्थापित किए। उनकी नौसेना नीति (Navy Policy) का उद्देश्य विदेशी शक्तियों के व्यापारिक एकाधिकार को तोड़ना था।

महाराज के बेड़े में 'गुराब', 'गैलिवेट' और 'पाल' जैसे विभिन्न प्रकार के युद्धपोत (Warships) शामिल थे। ये जहाज आकार में छोटे और बहुत तेज (Fast) थे, जिससे वे उथले पानी और संकरी खाड़ियों में आसानी से आवाजाही कर सकते थे। बड़े विदेशी जहाजों के लिए इन छोटे मराठा जहाजों का पीछा करना कठिन होता था। शिवाजी महाराज की नौसेना नीति (Navy Policy) में स्वदेशी तकनीकों (Indigenous Technologies) का उपयोग किया गया था जो भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल थीं।

समुद्री सुरक्षा के लिए उन्होंने खांडेरी, कुलाबा और सुवर्णदुर्ग जैसे किलों को अभेद्य बनाया। इन समुद्री अड्डों (Naval Bases) से मराठा नौसेना दुश्मन के जहाजों पर नजर रखती थी और उनसे 'दस्तक' (Trade Permit) वसूलती थी। कान्होजी आंग्रे जैसे कुशल नौसैनिक कमांडरों ने बाद में इसी नीति को आगे बढ़ाया। शिवाजी महाराज की नौसेना नीति (Navy Policy) ने यह सुनिश्चित किया कि भारत के पश्चिमी तट पर कोई भी बाहरी शक्ति बिना अनुमति के व्यापार न कर सके।

नौसेना के सैनिकों का प्रशिक्षण (Training) बहुत कठोर होता था और उन्हें समुद्र की लहरों और मौसम के बदलावों को समझने की कला सिखाई जाती थी। महाराज ने स्थानीय मछुआरों और कोली समुदाय के लोगों को अपनी नौसेना में भर्ती किया क्योंकि वे समुद्र के मिजाज (Nature of Sea) को सबसे बेहतर जानते थे। यह एक समावेशी सेना थी जहाँ कौशल (Skill) को जाति से ऊपर रखा गया था। उन्होंने समुद्री डाकुओं पर भी प्रभावी ढंग से नियंत्रण पाया।

शिवाजी महाराज की नौसेना नीति (Navy Policy) केवल युद्ध तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसमें समुद्री व्यापार (Maritime Trade) के विकास की भी सोच थी। उन्होंने अपने जहाजों का उपयोग माल ढोने और राजस्व (Revenue) बढ़ाने के लिए भी किया। उनकी दूरदर्शिता ने भारत को एक समुद्री शक्ति (Naval Power) के रूप में पुनर्जीवित किया। आज की भारतीय नौसेना भी महाराज के उन्हीं सिद्धांतों और प्रतीकों से प्रेरणा लेती है, जो राष्ट्र की अखंडता की रक्षा का आधार हैं।
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