बाजी प्रभु देशपांडे (Baji Prabhu Deshpande) मराठा साम्राज्य के वे अनमोल रत्न थे जिन्होंने अपनी स्वामिभक्ति से इतिहास रच दिया। जब पन्हाला किले की घेराबंदी से निकलकर शिवाजी महाराज विशालगढ़ की ओर बढ़ रहे थे, तब सिद्दी जौहर की सेना उनका पीछा कर रही थी। बाजी प्रभु ने 'घोडखिंड' नामक संकरे दर्रे (Narrow Pass) पर दुश्मन को रोकने का जिम्मा लिया ताकि महाराज सुरक्षित किले तक पहुँच सकें। उनके पास मात्र 300 सैनिक थे, जबकि दुश्मन की सेना हज़ारों में थी।
युद्ध के दौरान बाजी प्रभु ने अद्भुत पराक्रम (Extraordinary Valour) दिखाया और अकेले ही सैकड़ों सैनिकों का मुकाबला किया। उनके शरीर पर अनगिनत घाव (Wounds) थे, लेकिन उन्होंने तब तक हार नहीं मानी जब तक विशालगढ़ से तोप चलने की आवाज (Sound of Cannons) सुनाई नहीं दी। वह आवाज इस बात का संकेत थी कि महाराज सुरक्षित पहुँच चुके हैं। बाजी प्रभु देशपांडे (Baji Prabhu Deshpande) ने अपना कर्तव्य पूरा होते ही अंतिम सांस ली और उस स्थान को अपने रक्त से पवित्र कर दिया।
महाराज ने उनके इस महान बलिदान के सम्मान में उस जगह का नाम 'घोडखिंड' से बदलकर पावनखिंड (Sacred Pass) रख दिया। बाजी प्रभु की युद्ध कला (Warfare Skill) और दो तलवारों से एक साथ लड़ने की उनकी शैली को देखकर दुश्मन भी अचंभित रह गया था। उन्होंने सिद्ध किया कि यदि उद्देश्य महान हो, तो मुट्ठी भर सैनिक भी विशाल सेना को घंटों तक रोक सकते हैं। बाजी प्रभु देशपांडे (Baji Prabhu Deshpande) का नाम स्वराज्य के इतिहास में अटूट श्रद्धा के साथ लिया जाता है।
यह युद्ध रणनीति (Strategy) और धैर्य का एक बेहतरीन उदाहरण था। बाजी प्रभु जानते थे कि यदि महाराज पकड़े गए, तो स्वराज्य का सपना अधूरा रह जाएगा। उनकी इस निःस्वार्थ सेवा (Selfless Service) ने स्वराज्य को एक नया जीवन दिया। महाराज ने स्वयं उनके परिवार को सम्मानित किया और बाजी प्रभु के शौर्य को आने वाली पीढ़ियों के लिए आदर्श बनाया। पावनखिंड का हर पत्थर आज भी उस महान योद्धा के लहू की गवाही देता है।
आज के समय में बाजी प्रभु देशपांडे (Baji Prabhu Deshpande) का चरित्र हमें विपरीत परिस्थितियों में अडिग रहना सिखाता है। उनकी वीरता की कहानियाँ पढ़कर मन में राष्ट्र के प्रति समर्पण (Dedication) का भाव जाग्रत होता है। वे एक ऐसे योद्धा थे जिन्होंने मृत्यु को सामने देखकर भी अपने राजा के लिए ढाल का काम किया। उनकी यह शहादत मराठा इतिहास का वह गौरवशाली अध्याय है, जो सदैव हमारे हृदय में देशभक्ति (Patriotism) की ज्वाला जलाए रखेगा।