शिवाजी महाराज के प्रशासन में न्याय (Justice in Administration) निष्पक्षता और त्वरित कार्यवाही के लिए जाना जाता था। उनके स्वराज्य में 'न्यायाधीश' का पद अत्यंत महत्वपूर्ण था जो केवल धर्मग्रंथों और नैतिक कानूनों (Moral Laws) के आधार पर फैसला लेता था। महाराज ने यह स्पष्ट किया था कि कानून की नज़र में राजा का बेटा और एक गरीब किसान समान हैं। दंड का प्रावधान (Provision of Punishment) इतना कठोर था कि अपराधी अपराध करने से पहले सौ बार सोचता था, जिससे समाज में सुरक्षा का भाव उत्पन्न हुआ।
नागरिक सुरक्षा के लिए शिवाजी महाराज के प्रशासन में न्याय (Justice in Administration) का अर्थ था 'निर्भय समाज'। उन्होंने प्रत्येक गाँव के पाटिल और कुलकर्णी को जवाबदेह बनाया कि उनके क्षेत्र में किसी महिला या कमज़ोर के साथ अन्याय न हो। यदि कोई अधिकारी अपनी शक्ति का दुरुपयोग करता, तो उसे तुरंत पदमुक्त (Dismissed) कर दिया जाता था। इस प्रशासनिक सख्ती ने स्वराज्य को भ्रष्टाचार मुक्त (Corruption Free) बनाया और जनता का विश्वास जीता।
आर्थिक न्याय के मामले में शिवाजी महाराज के प्रशासन में न्याय (Justice in Administration) ने किसानों को साहूकारों के कर्ज के जाल से मुक्त किया। उन्होंने लगान की दरों को लचीला बनाया और प्राकृतिक आपदा के समय लगान पूरी तरह माफ करने की नीति अपनाई। महाराज का मानना था कि राज्य की समृद्धि (Prosperity) का रास्ता खेतों से होकर गुज़रता है। उन्होंने खेती के लिए नए औजार और बैल खरीदने के लिए सरकारी मदद (Government Aid) की व्यवस्था की, जो उस समय एक क्रांतिकारी कदम था।
धार्मिक मामलों में शिवाजी महाराज के प्रशासन में न्याय (Justice in Administration) अत्यंत उदार और सहिष्णु था। उन्होंने कभी भी किसी मंदिर या मस्जिद को क्षति पहुँचाने की अनुमति नहीं दी। उनके शासन में जो मुसलमान वफादार थे, उन्हें सेना और नौसेना में ऊँचे पद दिए गए। महाराज ने जबरन धर्म परिवर्तन (Forced Conversion) के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया लेकिन जो लोग स्वेच्छा से अपनी जड़ों की ओर लौटना चाहते थे, उनके लिए द्वार हमेशा खुले रखे।
शिवाजी महाराज के प्रशासन में न्याय (Justice in Administration) का उद्देश्य केवल सजा देना नहीं, बल्कि सुधार करना भी था। उन्होंने कैदियों के साथ मानवीय व्यवहार (Humane Treatment) सुनिश्चित किया। उनके इन्हीं गुणों के कारण जनता उन्हें 'रयतेचा राजा' (जनता का राजा) कहती थी। महाराज ने एक ऐसा मानक स्थापित किया जहाँ न्याय केवल कागजों तक सीमित नहीं था, बल्कि वह हर नागरिक के अनुभव (Experience) में झलकता था। उनका न्यायप्रिय शासन आज भी सुशासन की सबसे बड़ी मिसाल है।