ऐतिकाफ (I'tikaf) का अर्थ है दुनियावी कामों से कटकर अल्लाह की इबादत के लिए मस्जिद (Mosque) में कुछ समय के लिए ठहर जाना। रमज़ान के आख़िरी अशरे का ऐतिकाफ सुन्नत-ए-मुअक्कदा (Stressed Sunnah) है, जो शब-ए-क़द्र (Shab-i-Qadr) को पाने का सबसे बेहतरीन तरीका है। मुअतकिफ (Person in I'tikaf) अपनी पूरी रातें और दिन केवल अल्लाह की इबादत, ज़िक्र और दुआ में बिताता है, जिससे उसके और खालिक़ (Creator) के बीच का रिश्ता मज़बूत होता है।
ऐतिकाफ के नियमों (Rules of I'tikaf) के अनुसार, व्यक्ति को केवल मानवीय ज़रूरतों (Human Needs) के लिए ही मस्जिद से बाहर जाने की अनुमति होती है। बिना वजह बाहर जाने से ऐतिकाफ टूट सकता है। मस्जिद के एक कोने में पर्दा (Curtain) लगाकर जगह बनाई जाती है जहाँ व्यक्ति एकांत में अल्लाह से लौ लगाता है। शब-ए-क़द्र (Shab-i-Qadr) की खोज में ऐतिकाफ करने वाला हर ताक रात को इबादत में गुज़ारता है, जिससे उसके उस रात को पाने की संभावना बढ़ जाती है।
आध्यात्मिक लाभ (Spiritual Benefits) की बात करें तो ऐतिकाफ इंसान के मन से दुनिया का लालच (Greed for World) निकाल देता है। यह आत्म-अनुशासन (Self-discipline) का एक कठिन लेकिन फलदायी अभ्यास है। मुअतकिफ को अल्लाह की ओर से मानसिक शांति (Mental Peace) और रूहानी सुकून प्राप्त होता है। शब-ए-क़द्र (Shab-i-Qadr) की फ़ज़ीलत ऐतिकाफ में और भी बढ़ जाती है क्योंकि इंसान हर वक़त इबादत की हालत में रहता है।
महिलाओं के लिए भी अपने घरों में एक निश्चित स्थान (Specific Place) बनाकर ऐतिकाफ करने का प्रावधान है। इससे परिवार के माहौल में भी दीनदारी और बरकत आती है। ऐतिकाफ हमें यह सिखाता है कि अल्लाह की याद में समय बिताना ही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि (Achievement) है। शब-ए-क़द्र (Shab-i-Qadr) की तलाश में किया गया यह त्याग अल्लाह के नज़दीक बहुत महबूब है।
ऐतिकाफ समाप्त होने पर इंसान एक नई ऊर्जा (New Energy) और सकारात्मकता के साथ दुनिया में वापस आता है। वह अपने जीवन के नए लक्ष्य तय करता है जो अल्लाह की मर्ज़ी के अनुसार हों। शब-ए-क़द्र (Shab-i-Qadr) और ऐतिकाफ का संगम इंसान के चरित्र निर्माण (Character Building) में सहायक होता है। यह दस दिनों का एकांत वास एक साल की रूहानी बैटरी को चार्ज करने जैसा है।