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जुमात-उल-विदा की नमाज़ (Prayer of Jamat Ul-Vida) पढ़ने का तरीका सामान्य शुक्रवार की नमाज़ जैसा ही होता है। यह नमाज़ ज़ुहर (Afternoon) के समय में पढ़ी जाती है और इसमें दो रकात फ़र्ज़ (Obligatory) नमाज़ इमाम के पीछे पढ़नी अनिवार्य है। नमाज़ से पहले इमाम द्वारा दो खुतबे (Two Sermons) दिए जाते हैं, जिन्हें सुनना हर नमाज़ी के लिए ज़रूरी (Compulsory) है। खुतबे के दौरान बात करना या किसी को टोकना मना है, क्योंकि यह नमाज़ का हिस्सा माना जाता है।

नमाज़ के लिए मस्जिद जाने से पहले सुन्नत (Sunnah) के अनुसार नाखून काटना, मिस्वाक करना और खुशबू (Perfume) लगाना उत्तम माना जाता है। जुमात-उल-विदा की नमाज़ (Prayer of Jamat Ul-Vida) के लिए पहली सफ (First Row) में जगह पाने की कोशिश करना बहुत सवाब (Reward) का काम है। लोग समय से काफी पहले ही मस्जिदों में पहुँच जाते हैं ताकि वे ज़िक्र और दरूद शरीफ़ (Salutation) पढ़ सकें। यह दिन इबादत की पाबंदी (Punctuality) सिखाता है।

शहर की बड़ी जामा मस्जिदों (Grand Mosques) में जुमात-उल-विदा की नमाज़ (Prayer of Jamat Ul-Vida) का समय अक्सर निश्चित होता है, जिसकी सूचना पहले ही दे दी जाती है। भीड़ को देखते हुए प्रशासन (Administration) और वोलंटियर्स (Volunteers) यातायात और सुरक्षा की विशेष व्यवस्था करते हैं। नमाज़ के बाद विशेष सामूहिक दुआ (Collective Supplication) मांगी जाती है जिसमें देश और दुनिया की शांति (Peace) के लिए इल्तिजा की जाती है।

यदि कोई व्यक्ति किसी कारणवश जुमात-उल-विदा की नमाज़ (Prayer of Jamat Ul-Vida) में शामिल नहीं हो पाता, तो उसे उसके बदले सामान्य ज़ुहर की नमाज़ (Normal Afternoon Prayer) अदा करनी चाहिए। हालांकि, इस दिन की जमात (Congregation) का सवाब बहुत बड़ा है, इसलिए हर मुसलमान इसमें शामिल होने की पूरी कोशिश करता है। यह नमाज़ इंसान के ईमान (Faith) को ताज़गी प्रदान करती है और उसे रूहानी शक्ति (Spiritual Power) देती है।

नमाज़ मुकम्मल होने के बाद लोग मस्जिदों में बैठकर तस्बीह (Rosary) पढ़ते हैं और अल्लाह की बड़ाई बयान करते हैं। जुमात-उल-विदा की नमाज़ (Prayer of Jamat Ul-Vida) हमें यह संदेश देती है कि हमारी इबादतें केवल रमज़ान तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह दिन आने वाली ईद (Upcoming Eid) की खुशियों के लिए रूहानी तैयारी करने का अंतिम पड़ाव है। इस नमाज़ के ज़रिए पूरी दुनिया के मुसलमान एक ही समय पर एक ही दिशा में सिर झुकाकर एकता की मिसाल पेश करते हैं।

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जुमात-उल-विदा की नमाज़ (Prayer of Jamat Ul-Vida) पढ़ने का तरीका सामान्य शुक्रवार की नमाज़ जैसा ही होता है। यह नमाज़ ज़ुहर (Afternoon) के समय में पढ़ी जाती है और इसमें दो रकात फ़र्ज़ (Obligatory) नमाज़ इमाम के पीछे पढ़नी अनिवार्य है। नमाज़ से पहले इमाम द्वारा दो खुतबे (Two Sermons) दिए जाते हैं, जिन्हें सुनना हर नमाज़ी के लिए ज़रूरी (Compulsory) है। खुतबे के दौरान बात करना या किसी को टोकना मना है, क्योंकि यह नमाज़ का हिस्सा माना जाता है।

नमाज़ के लिए मस्जिद जाने से पहले सुन्नत (Sunnah) के अनुसार नाखून काटना, मिस्वाक करना और खुशबू (Perfume) लगाना उत्तम माना जाता है। जुमात-उल-विदा की नमाज़ (Prayer of Jamat Ul-Vida) के लिए पहली सफ (First Row) में जगह पाने की कोशिश करना बहुत सवाब (Reward) का काम है। लोग समय से काफी पहले ही मस्जिदों में पहुँच जाते हैं ताकि वे ज़िक्र और दरूद शरीफ़ (Salutation) पढ़ सकें। यह दिन इबादत की पाबंदी (Punctuality) सिखाता है।

शहर की बड़ी जामा मस्जिदों (Grand Mosques) में जुमात-उल-विदा की नमाज़ (Prayer of Jamat Ul-Vida) का समय अक्सर निश्चित होता है, जिसकी सूचना पहले ही दे दी जाती है। भीड़ को देखते हुए प्रशासन (Administration) और वोलंटियर्स (Volunteers) यातायात और सुरक्षा की विशेष व्यवस्था करते हैं। नमाज़ के बाद विशेष सामूहिक दुआ (Collective Supplication) मांगी जाती है जिसमें देश और दुनिया की शांति (Peace) के लिए इल्तिजा की जाती है।

यदि कोई व्यक्ति किसी कारणवश जुमात-उल-विदा की नमाज़ (Prayer of Jamat Ul-Vida) में शामिल नहीं हो पाता, तो उसे उसके बदले सामान्य ज़ुहर की नमाज़ (Normal Afternoon Prayer) अदा करनी चाहिए। हालांकि, इस दिन की जमात (Congregation) का सवाब बहुत बड़ा है, इसलिए हर मुसलमान इसमें शामिल होने की पूरी कोशिश करता है। यह नमाज़ इंसान के ईमान (Faith) को ताज़गी प्रदान करती है और उसे रूहानी शक्ति (Spiritual Power) देती है।

नमाज़ मुकम्मल होने के बाद लोग मस्जिदों में बैठकर तस्बीह (Rosary) पढ़ते हैं और अल्लाह की बड़ाई बयान करते हैं। जुमात-उल-विदा की नमाज़ (Prayer of Jamat Ul-Vida) हमें यह संदेश देती है कि हमारी इबादतें केवल रमज़ान तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह दिन आने वाली ईद (Upcoming Eid) की खुशियों के लिए रूहानी तैयारी करने का अंतिम पड़ाव है। इस नमाज़ के ज़रिए पूरी दुनिया के मुसलमान एक ही समय पर एक ही दिशा में सिर झुकाकर एकता की मिसाल पेश करते हैं।
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