ईदी (Eidi) उस उपहार या नकद राशि (Cash Gift) को कहा जाता है जो ईद के दिन बड़े अपने से छोटों को देते हैं। यह परंपरा बच्चों के लिए ईद का सबसे रोमांचक हिस्सा होती है। जैसे ही नमाज़ खत्म होती है, बच्चे घर के बड़ों के पैर छूकर या सलाम (Salutation) करके अपनी ईदी की मांग करते हैं। यह केवल पैसों का लेन-देन नहीं है, बल्कि यह आशीर्वाद और प्यार (Love and Blessing) को साझा करने का एक तरीका है।
बच्चों के लिए ईदी (Eidi) प्राप्त करना उनकी महीने भर की मेहनत और रोज़ों के सम्मान जैसा होता है। वे पहले से ही योजना बना लेते हैं कि वे इस धन (Money) से क्या खिलौने या खाने की चीज़ें खरीदेंगे। कई बार ईदी में नए कपड़े, घड़ियाँ या अन्य व्यक्तिगत वस्तुएं (Personal Items) भी दी जाती हैं। यह रिवाज परिवारों में खुशी और उत्साह का संचार करता है। बड़ों के लिए भी यह गर्व का पल होता है जब वे अगली पीढ़ी को खुशियाँ प्रदान करते हैं।
आधुनिक समय में ईदी (Eidi) देने के तरीकों में बदलाव आया है और अब कई लोग डिजिटल भुगतान (Digital Payment) या गिफ्ट वाउचर का भी उपयोग करते हैं। हालांकि, लिफाफे में रखे कड़क नोटों (Crisp Notes) का आकर्षण आज भी बरकरार है। ईदी की यह रस्म बच्चों को रिश्तों की अहमियत और बड़ों के प्रति सम्मान (Respect for Elders) सिखाती है। यह त्योहार की रौनक को कई गुना बढ़ा देता है।
ईदी (Eidi) देने की कोई निश्चित राशि तय नहीं होती, यह व्यक्ति की अपनी क्षमता और इच्छा पर निर्भर करता है। कई बार गरीब बच्चों को भी ईदी दी जाती है ताकि वे भी समाज की मुख्यधारा (Mainstream) से जुड़ा हुआ महसूस कर सकें। यह उदारता (Generosity) का एक प्रतीक है जो बचपन की यादों में हमेशा के लिए दर्ज हो जाता है। ईदी पाने की होड़ में भाई-बहनों के बीच होने वाली मीठी नोक-झोंक उत्सव का मजा बढ़ा देती है।
अंततः ईदी (Eidi) का सांस्कृतिक महत्व यह है कि यह पीढ़ियों के बीच एक मजबूत सेतु (Bridge) का निर्माण करती है। यह छोटों को बड़ों की छत्रछाया और बड़ों को छोटों की मासूमियत (Innocence) से जोड़ती है। ईद की हर महफ़िल में ईदी की चर्चा ज़रूर होती है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी पूरी शिद्दत के साथ निभाई जाती है। ईदी के बिना ईद का त्योहार अधूरा सा महसूस होता है।