सरहुल पूजा (Sarhul Puja) में साल के वृक्ष (Sal Tree) को पवित्रता का सर्वोच्च स्थान दिया गया है क्योंकि यह आदिवासियों की आजीविका और आवास का मुख्य स्रोत रहा है। पूजा स्थल जिसे 'सरना स्थल' (Sarna Sthal) कहा जाता है, वहाँ साल के फूलों को अर्पित किया जाता है। ये फूल नई शुरुआत और उर्वरता (Fertility) के प्रतीक माने जाते हैं। पाहन इन फूलों को जल में डुबोकर लोगों पर छिड़कता है, जो शुद्धिकरण (Purification) की प्रक्रिया का हिस्सा है।
मिट्टी के दो घड़ों (Earthen Pots) का उपयोग इस त्योहार की सबसे दिलचस्प भविष्यवक्ता परंपरा (Predictive Tradition) के लिए किया जाता है। पूजा के दौरान इन घड़ों को जल से भरा जाता है और सरना स्थल पर रखा जाता है। अगले दिन सुबह पाहन घड़ों के जल स्तर (Water Level) की जांच करता है। यदि जल स्तर समान रहता है, तो माना जाता है कि उस वर्ष अच्छी वर्षा (Good Rainfall) होगी, और यदि जल कम होता है, तो सूखे की आशंका जताई जाती है। यह प्राचीन मौसम विज्ञान (Ancient Meteorology) का एक अद्भुत उदाहरण है।
अनुष्ठान के अगले भाग में मुर्गों की बलि (Sacrifice of Cocks) दी जाती है और उनका मांस प्रसाद के रूप में पकाया जाता है। इस भोजन को 'सुड़ी' (Sudi) कहा जाता है, जिसे पूरा गाँव मिलकर ग्रहण करता है। पूजा में उपयोग किए गए साल के फूल (Sal Flowers) महिलाओं द्वारा अपने जूड़े में लगाए जाते हैं और पुरुष इन्हें अपने कानों के पीछे रखते हैं। यह श्रृंगार प्रकृति के साथ एकात्मकता (Unity with Nature) का प्रदर्शन करता है।
सरहुल पूजा (Sarhul Puja) के दिन कृषि कार्य जैसे हल चलाना या खुदाई करना पूर्णतः वर्जित (Strictly Prohibited) होता है। मान्यता है कि इस दिन धरती माता विश्राम (Rest) करती हैं और उन्हें चोट पहुँचाना पाप है। यह परंपरा भूमि के विश्राम और मृदा संरक्षण (Soil Conservation) के वैज्ञानिक महत्व को भी दर्शाती है। लोग अपने खेतों में खाद के रूप में भी साल के पत्तों और राख का उपयोग करते हैं, जो जैविक खेती (Organic Farming) को बढ़ावा देता है।
शाम के समय साल के फूलों (Sal Flowers) को लेकर भव्य शोभायात्रा (Procession) निकाली जाती है। लोग अपने पारंपरिक वाद्ययंत्रों (Traditional Instruments) के साथ नृत्य करते हुए पूरे गाँव का भ्रमण करते हैं। यह जुलूस सामुदायिक शक्ति और सांस्कृतिक पहचान (Cultural Identity) को उजागर करता है। सरहुल की ये बारीक रस्में हमें सिखाती हैं कि मनुष्य और प्रकृति का अटूट रिश्ता ही ब्रह्मांड की निरंतरता का आधार है।