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फांसी से पहले के अंतिम दिन भगत सिंह के जीवन के सबसे गरिमापूर्ण (Dignified) पलों में से एक थे। जेल की कोठरी में होने के बावजूद वे कभी उदास या डरे हुए नहीं दिखे। उनकी सबसे बड़ी इच्छा यह थी कि उन्हें आज़ाद भारत (Independent India) देखने को मिले, जिसके लिए वे खुशी-खुशी बलिदान दे रहे थे। उन्होंने अपने अंतिम पत्र में अपने साथियों से कहा था कि "हौसला न हारना, मेरी शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी"। उनकी आंखों में मृत्यु का भय नहीं, बल्कि देश के सुनहरे भविष्य का सपना था।

अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले वे क्रांतिकारी लेनिन की जीवनी (Biography of Lenin) पढ़ रहे थे। जब जेलर ने उन्हें फांसी के लिए चलने को कहा, तो उन्होंने बड़े शांत भाव से जवाब दिया, "रुको, एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है"। यह उनकी बौद्धिक भूख (Intellectual Hunger) और अध्ययन के प्रति प्रेम को दर्शाता है। वे आख़िरी सांस तक सीखना चाहते थे और दुनिया को बेहतर बनाने के विचारों में खोए हुए थे। उनकी यह सहजता जेल के अधिकारियों के लिए भी अचंभे का विषय थी।

भगत सिंह की एक और इच्छा थी कि उन्हें फांसी देने के बजाय एक सैनिक की तरह गोली मार दी जाए (Execution by Firing Squad), क्योंकि वे खुद को युद्धबंदी (Prisoner of War) मानते थे। हालांकि ब्रिटिश सरकार ने उनकी इस मांग को ठुकरा दिया। फांसी के फंदे तक जाते समय वे और उनके साथी देशभक्ति के गीत (Patriotic Songs) गा रहे थे। उनकी मुस्कुराहट ने जेल की काल कोठरी के अंधेरे को भी मात दे दी थी। यह दृश्य साहस और बलिदान (Sacrifice) की पराकाष्ठा था।

उन्होंने अपने परिवार को लिखे पत्रों में धैर्य रखने की सलाह दी और गर्व महसूस करने को कहा। उन्होंने चाहा था कि उनकी राख (Ashes) को भारत की मिट्टी में मिला दिया जाए ताकि वे हमेशा के लिए अपनी मातृभूमि का हिस्सा बन सकें। उनकी निडरता का आलम यह था कि फांसी से पहले उनका वज़न (Weight) कम होने के बजाय बढ़ गया था। यह मानसिक दृढ़ता और आत्मा की शांति (Peace of Soul) का सबसे बड़ा प्रमाण था।

फांसी के बाद उनके अवशेषों (Remains) को चुपचाप सतलुज नदी के किनारे जला दिया गया था, लेकिन उनकी यादें करोड़ों भारतीयों के दिलों में बस गईं। उनकी अंतिम इच्छाओं में देश की एकता और सामाजिक न्याय (Social Justice) का भाव सबसे ऊपर था। आज भी 23 मार्च को लोग उनके उन सपनों को याद करते हैं जो उन्होंने अपनी आखिरी सांस के साथ बुने थे। भगत सिंह का जीवन और मृत्यु दोनों ही आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मार्गदर्शक (Guide) बन गए।

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फांसी से पहले के अंतिम दिन भगत सिंह के जीवन के सबसे गरिमापूर्ण (Dignified) पलों में से एक थे। जेल की कोठरी में होने के बावजूद वे कभी उदास या डरे हुए नहीं दिखे। उनकी सबसे बड़ी इच्छा यह थी कि उन्हें आज़ाद भारत (Independent India) देखने को मिले, जिसके लिए वे खुशी-खुशी बलिदान दे रहे थे। उन्होंने अपने अंतिम पत्र में अपने साथियों से कहा था कि "हौसला न हारना, मेरी शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी"। उनकी आंखों में मृत्यु का भय नहीं, बल्कि देश के सुनहरे भविष्य का सपना था।

अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले वे क्रांतिकारी लेनिन की जीवनी (Biography of Lenin) पढ़ रहे थे। जब जेलर ने उन्हें फांसी के लिए चलने को कहा, तो उन्होंने बड़े शांत भाव से जवाब दिया, "रुको, एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है"। यह उनकी बौद्धिक भूख (Intellectual Hunger) और अध्ययन के प्रति प्रेम को दर्शाता है। वे आख़िरी सांस तक सीखना चाहते थे और दुनिया को बेहतर बनाने के विचारों में खोए हुए थे। उनकी यह सहजता जेल के अधिकारियों के लिए भी अचंभे का विषय थी।

भगत सिंह की एक और इच्छा थी कि उन्हें फांसी देने के बजाय एक सैनिक की तरह गोली मार दी जाए (Execution by Firing Squad), क्योंकि वे खुद को युद्धबंदी (Prisoner of War) मानते थे। हालांकि ब्रिटिश सरकार ने उनकी इस मांग को ठुकरा दिया। फांसी के फंदे तक जाते समय वे और उनके साथी देशभक्ति के गीत (Patriotic Songs) गा रहे थे। उनकी मुस्कुराहट ने जेल की काल कोठरी के अंधेरे को भी मात दे दी थी। यह दृश्य साहस और बलिदान (Sacrifice) की पराकाष्ठा था।

उन्होंने अपने परिवार को लिखे पत्रों में धैर्य रखने की सलाह दी और गर्व महसूस करने को कहा। उन्होंने चाहा था कि उनकी राख (Ashes) को भारत की मिट्टी में मिला दिया जाए ताकि वे हमेशा के लिए अपनी मातृभूमि का हिस्सा बन सकें। उनकी निडरता का आलम यह था कि फांसी से पहले उनका वज़न (Weight) कम होने के बजाय बढ़ गया था। यह मानसिक दृढ़ता और आत्मा की शांति (Peace of Soul) का सबसे बड़ा प्रमाण था।

फांसी के बाद उनके अवशेषों (Remains) को चुपचाप सतलुज नदी के किनारे जला दिया गया था, लेकिन उनकी यादें करोड़ों भारतीयों के दिलों में बस गईं। उनकी अंतिम इच्छाओं में देश की एकता और सामाजिक न्याय (Social Justice) का भाव सबसे ऊपर था। आज भी 23 मार्च को लोग उनके उन सपनों को याद करते हैं जो उन्होंने अपनी आखिरी सांस के साथ बुने थे। भगत सिंह का जीवन और मृत्यु दोनों ही आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मार्गदर्शक (Guide) बन गए।
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