भगत सिंह (Bhagat Singh), सुखदेव (Sukhdev) और राजगुरु (Rajguru) को फांसी दिए जाने का सबसे बड़ा कारण लाहौर षड्यंत्र केस (Lahore Conspiracy Case) था। इस मामले में उन पर ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स (John Saunders) की हत्या का आरोप लगा था। क्रांतिकारियों ने लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के लिए यह कदम उठाया था। ब्रिटिश हुकूमत (British Rule) इन युवाओं की बढ़ती लोकप्रियता और उनके क्रांतिकारी विचारों (Revolutionary Ideas) से बुरी तरह डर गई थी, इसलिए उन्हें मृत्युदंड दिया गया।
न्यायालय की कार्यवाही (Court Proceedings) के दौरान भी इन वीरों ने कभी अपनी जान की भीख नहीं मांगी। उन्होंने अदालत को अपने राजनीतिक विचारों (Political Thoughts) के प्रचार का माध्यम बना लिया। फांसी की सजा मिलने के बाद पूरे भारत में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ जनाक्रोश (Public Anger) चरम पर था। लोगों का मानना था कि यह केवल एक कानूनी सजा नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन (Independence Movement) को दबाने की एक सोची-समझी साजिश थी।
फांसी का समय असल में 24 मार्च 1931 तय किया गया था, लेकिन जेल प्रशासन (Prison Administration) ने गुप्त तरीके से 11 घंटे पहले ही यह प्रक्रिया पूरी कर ली। जेल के बाहर हजारों की भीड़ जमा थी जो अपने नायक (Hero) को बचाने के लिए संघर्ष कर रही थी। अंग्रेज़ों ने शवों का अंतिम संस्कार (Funeral) भी अत्यंत गोपनीयता के साथ सतलुज नदी के किनारे फिरोजपुर में किया। यह घटना इतिहास में साम्राज्यशाही (Imperialism) के क्रूरतम चेहरों में से एक मानी जाती है।
भगत सिंह की शहादत (Martyrdom) ने देश के नौजवानों में देशप्रेम का ऐसा जज्बा पैदा किया जो महात्मा गांधी के अहिंसक आंदोलन (Non-violence Movement) के समानांतर चलता रहा। उनके बलिदान ने यह साबित कर दिया कि भारतीय अब विदेशी दासता (Foreign Slavery) को और अधिक समय तक स्वीकार नहीं करेंगे। इस बलिदान ने ब्रिटिश सत्ता की जड़ों (Roots) को हिलाकर रख दिया था। आज भी 23 मार्च का दिन हमें उस सर्वोच्च त्याग (Supreme Sacrifice) की याद दिलाता है।
शहीद दिवस (Shaheed Diwas) के मौके पर पूरा देश इन महान क्रांतिकारियों की वीरता (Valour) को नमन करता है। यह दिन केवल एक तारीख नहीं है, बल्कि यह अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का एक संकल्प (Commitment) है। भगत सिंह ने अपने लेखों में साफ कहा था कि क्रांति का अर्थ केवल खून-खराबा नहीं, बल्कि समाज में बदलाव (Change in Society) लाना है। उनका यह दृष्टिकोण आज के आधुनिक भारत (Modern India) के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है।