महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण (Valmiki Ramayan) को संस्कृत भाषा में लिखा गया मूल ग्रंथ (Original Text) माना जाता है, जबकि गोस्वामी तुलसीदास जी की रामचरितमानस (Ramcharitmanas) को अवधी भाषा (Awadhi Language) में लिखा गया है। वाल्मीकि रामायण में श्री राम को एक 'मर्यादा पुरुषोत्तम' मानव के रूप में अधिक चित्रित किया गया है, जो अपने कर्मों से ईश्वरत्व प्राप्त करते हैं। इसके विपरीत, रामचरितमानस में भगवान राम को साक्षात विष्णु का पूर्ण अवतार (Incarnation of Vishnu) और सर्वशक्तिमान ईश्वर के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जहाँ उनकी भक्ति (Devotion) पर अधिक बल दिया गया है।
रचना के समय की दृष्टि से वाल्मीकि रामायण त्रेता युग की समकालीन (Contemporary) मानी जाती है, जबकि रामचरितमानस की रचना मध्यकाल (Medieval Period) में भक्ति आंदोलन के दौरान हुई थी। वाल्मीकि जी ने सात कांडों में श्लोकों (Verses) का प्रयोग किया है, वहीं तुलसीदास जी ने चौपाई और दोहा (Couplets) छंदों के माध्यम से जन-सामान्य तक राम कथा पहुँचाई। रामायण एक ऐतिहासिक महाकाव्य (Historical Epic) की श्रेणी में आता है, जबकि मानस एक महान भक्ति काव्य (Devotional Poetry) है जिसने उत्तर भारत के घर-घर में राम नाम को प्रतिष्ठित किया।
कथा के प्रसंगों में भी कुछ सूक्ष्म भिन्नताएँ (Subtle Differences) दिखाई देती हैं, जैसे रामचरितमानस में 'अग्नि परीक्षा' के समय असली सीता के स्थान पर छाया सीता (Shadow Sita) का वर्णन मिलता है, जबकि मूल रामायण में वर्णन अधिक यथार्थवादी है। वाल्मीकि रामायण में लक्ष्मण रेखा (Laxman Rekha) का स्पष्ट उल्लेख उस रूप में नहीं है जैसा लोक कथाओं या मानस के कुछ संस्करणों में प्रसिद्ध हुआ। वाल्मीकि जी का दृष्टिकोण एक ऋषि का है जो सत्य की स्थापना (Establishment of Truth) को केंद्र में रखते हैं, जबकि तुलसीदास जी का दृष्टिकोण एक अनन्य भक्त का है जो मोक्ष (Salvation) चाहते हैं।
दार्शनिक आधार पर देखें तो वाल्मीकि रामायण में राजनीति, कूटनीति और राजधर्म (Royal Ethics) के सिद्धांतों का विस्तार से वर्णन मिलता है जो एक शासक के लिए मार्गदर्शक हैं। तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में नाम जप, शरणागति और आपसी प्रेम (Mutual Love) को जीवन का सार बताया है। वाल्मीकि रामायण को पढ़ने के लिए संस्कृत का ज्ञान आवश्यक है, लेकिन रामचरितमानस अपनी सरल लोकभाषा (Folk Language) के कारण आम जनता के बीच अधिक लोकप्रिय और सुलभ हो सकी। दोनों ही ग्रंथों का उद्देश्य मर्यादा पुरुषोत्तम के आदर्शों (Ideals of Lord Ram) को समाज में स्थापित करना है।
सांस्कृतिक प्रभाव की बात करें तो वाल्मीकि रामायण वैश्विक स्तर पर विभिन्न देशों की कला और नृत्य (Art and Dance) का आधार बनी है। वहीं रामचरितमानस भारतीय मानस पटल पर नैतिकता और पारिवारिक मूल्यों (Family Values) की नियमावली के रूप में अंकित है। वाल्मीकि रामायण एक तपस्वी की लेखनी से निकला सत्य है और रामचरितमानस एक साधक के हृदय से निकला प्रेम का सागर है। इन दोनों महाकाव्यों ने मिलकर भारतीय सभ्यता (Indian Civilization) को एक मज़बूत नैतिक आधार और आध्यात्मिक चेतना (Spiritual Consciousness) प्रदान की है।