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अहिंसा परमो धर्म (Ahimsa Parmo Dharma) जैन धर्म का मूल मंत्र है, जिसका अर्थ है कि अहिंसा ही सबसे बड़ा धर्म है। जैन दर्शन (Jain Philosophy) के अनुसार अहिंसा का अर्थ केवल किसी की हत्या न करना ही नहीं है, बल्कि किसी भी जीव को मन, वचन या कर्म (Mind, Speech or Action) से कष्ट न पहुँचाना है। भगवान महावीर ने सिखाया कि प्रत्येक जीव में आत्मा का निवास है, इसलिए हमें सूक्ष्म जीवों (Microorganisms) के प्रति भी दया भाव रखना चाहिए। यह सिद्धांत संपूर्ण मानवता के लिए शांति और सह-अस्तित्व (Co-existence) का आधार है।

अहिंसा (Non-violence) का पालन करने के लिए जैन दर्शन में पांच महाव्रतों (Five Great Vows) का उल्लेख किया गया है, जिनमें अहिंसा सर्वोपरि है। इसका आध्यात्मिक महत्व यह है कि हिंसा करने से आत्मा पर कर्मों का बंधन (Bondage of Karma) बढ़ता है, जो मोक्ष की प्राप्ति में बाधक है। जब हम किसी के प्रति बुरा विचार लाते हैं, तो वह 'भाव हिंसा' कहलाती है, जो भौतिक हिंसा से भी अधिक हानिकारक मानी गई है। मन की शुद्धता और करुणा (Compassion) ही एक सच्चे श्रावक की पहचान है।

जैन धर्म उत्सव (Jain Dharma Utsav) के दौरान अहिंसा के इसी संदेश को रैलियों और सभाओं के माध्यम से प्रसारित किया जाता है। भगवान महावीर ने कहा था कि "जियो और जीने दो" (Live and Let Live), जिसका अर्थ है कि जिस प्रकार हमें अपना जीवन प्रिय है, वैसे ही अन्य जीवों को भी है। यह दर्शन पर्यावरण संरक्षण (Environmental Protection) और शाकाहार (Vegetarianism) को बढ़ावा देता है। आज के समय में जब दुनिया युद्ध और नफरत से जूझ रही है, तब अहिंसा का यह विचार अत्यंत प्रासंगिक (Relevant) हो गया है।

व्यक्तिगत स्तर पर अहिंसा (Non-violence) का अभ्यास करने से क्रोध, लोभ और अहंकार का नाश होता है। यह मनुष्य को सहनशील (Tolerant) और धैर्यवान बनाता है, जिससे सामाजिक समरसता बढ़ती है। महावीर स्वामी ने सिखाया कि शत्रुओं पर विजय तलवार से नहीं, बल्कि क्षमा और प्रेम (Forgiveness and Love) से प्राप्त की जा सकती है। अहिंसा का मार्ग कायरता नहीं, बल्कि अदम्य साहस और आत्मिक बल (Spiritual Strength) का परिचय देता है। यह सिद्धांत समस्त विकारों को दूर कर आत्मा को पवित्र बनाता है।

जैन धर्म (Jainism) में अहिंसा को एक विज्ञान की तरह समझाया गया है, जहाँ हर क्रिया का फल सुनिश्चित होता है। खान-पान से लेकर बोलचाल तक में अहिंसा का पालन करना एक साधना है। 'अहिंसा परमो धर्म' (Ahimsa Parmo Dharma) का नारा हमें याद दिलाता है कि मानवता की सेवा और जीवों की रक्षा ही ईश्वर की सच्ची पूजा है। यह वैश्विक शांति (Global Peace) का एकमात्र मार्ग है जो शत्रुता को मित्रता में बदलने की शक्ति रखता है। महावीर के इस महान सत्य ने सदियों से दुनिया को प्रेरित किया है।

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अहिंसा परमो धर्म (Ahimsa Parmo Dharma) जैन धर्म का मूल मंत्र है, जिसका अर्थ है कि अहिंसा ही सबसे बड़ा धर्म है। जैन दर्शन (Jain Philosophy) के अनुसार अहिंसा का अर्थ केवल किसी की हत्या न करना ही नहीं है, बल्कि किसी भी जीव को मन, वचन या कर्म (Mind, Speech or Action) से कष्ट न पहुँचाना है। भगवान महावीर ने सिखाया कि प्रत्येक जीव में आत्मा का निवास है, इसलिए हमें सूक्ष्म जीवों (Microorganisms) के प्रति भी दया भाव रखना चाहिए। यह सिद्धांत संपूर्ण मानवता के लिए शांति और सह-अस्तित्व (Co-existence) का आधार है।

अहिंसा (Non-violence) का पालन करने के लिए जैन दर्शन में पांच महाव्रतों (Five Great Vows) का उल्लेख किया गया है, जिनमें अहिंसा सर्वोपरि है। इसका आध्यात्मिक महत्व यह है कि हिंसा करने से आत्मा पर कर्मों का बंधन (Bondage of Karma) बढ़ता है, जो मोक्ष की प्राप्ति में बाधक है। जब हम किसी के प्रति बुरा विचार लाते हैं, तो वह 'भाव हिंसा' कहलाती है, जो भौतिक हिंसा से भी अधिक हानिकारक मानी गई है। मन की शुद्धता और करुणा (Compassion) ही एक सच्चे श्रावक की पहचान है।

जैन धर्म उत्सव (Jain Dharma Utsav) के दौरान अहिंसा के इसी संदेश को रैलियों और सभाओं के माध्यम से प्रसारित किया जाता है। भगवान महावीर ने कहा था कि "जियो और जीने दो" (Live and Let Live), जिसका अर्थ है कि जिस प्रकार हमें अपना जीवन प्रिय है, वैसे ही अन्य जीवों को भी है। यह दर्शन पर्यावरण संरक्षण (Environmental Protection) और शाकाहार (Vegetarianism) को बढ़ावा देता है। आज के समय में जब दुनिया युद्ध और नफरत से जूझ रही है, तब अहिंसा का यह विचार अत्यंत प्रासंगिक (Relevant) हो गया है।

व्यक्तिगत स्तर पर अहिंसा (Non-violence) का अभ्यास करने से क्रोध, लोभ और अहंकार का नाश होता है। यह मनुष्य को सहनशील (Tolerant) और धैर्यवान बनाता है, जिससे सामाजिक समरसता बढ़ती है। महावीर स्वामी ने सिखाया कि शत्रुओं पर विजय तलवार से नहीं, बल्कि क्षमा और प्रेम (Forgiveness and Love) से प्राप्त की जा सकती है। अहिंसा का मार्ग कायरता नहीं, बल्कि अदम्य साहस और आत्मिक बल (Spiritual Strength) का परिचय देता है। यह सिद्धांत समस्त विकारों को दूर कर आत्मा को पवित्र बनाता है।

जैन धर्म (Jainism) में अहिंसा को एक विज्ञान की तरह समझाया गया है, जहाँ हर क्रिया का फल सुनिश्चित होता है। खान-पान से लेकर बोलचाल तक में अहिंसा का पालन करना एक साधना है। 'अहिंसा परमो धर्म' (Ahimsa Parmo Dharma) का नारा हमें याद दिलाता है कि मानवता की सेवा और जीवों की रक्षा ही ईश्वर की सच्ची पूजा है। यह वैश्विक शांति (Global Peace) का एकमात्र मार्ग है जो शत्रुता को मित्रता में बदलने की शक्ति रखता है। महावीर के इस महान सत्य ने सदियों से दुनिया को प्रेरित किया है।
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