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जैन धर्म में प्रतिक्रमण (Pratikraman) एक ऐसी आध्यात्मिक प्रक्रिया है जिसका अर्थ है "पीछे लौटना" यानी अपनी गलतियों को सुधारना। यह आत्म-निरीक्षण (Introspection) की एक अद्भुत विधि है जिसमें साधक दिन भर या वर्ष भर में किए गए जाने-अनजाने पापों के लिए क्षमा मांगता है। प्रतिक्रमण का मुख्य उद्देश्य आत्मा पर चढ़े हुए कर्मों के मैल (Stain of Karma) को साफ करना है। जब हम अपनी भूलों को स्वीकार करते हैं, तो हमारे भीतर विनम्रता और शुद्धता (Humility and Purity) का उदय होता है।

प्रतिक्रमण (Pratikraman) की विधि में विभिन्न आसनों और कायोत्सर्ग (Meditation) का अभ्यास किया जाता है। साधक "मिच्छामि दुक्कड़म" (Michchhami Dukkadam) मंत्र का उच्चारण करता है, जिसका अर्थ है कि मेरे द्वारा किए गए सभी बुरे कार्य निष्फल हों। यह साधना सुबह और शाम दो समय की जाती है, जिसे 'देवसी' और 'रायी' प्रतिक्रमण कहा जाता है। इस प्रक्रिया में मन, वचन और काया (Mind, Speech and Body) की एकाग्रता आवश्यक है। यह अभ्यास मनुष्य को उसके नैतिक कर्तव्यों (Moral Duties) के प्रति सदैव सचेत रखता है।

आध्यात्मिक रूप से प्रतिक्रमण (Pratikraman) का महत्व यह है कि यह हमें अहंकार और राग-द्वेष (Attachment and Aversion) से मुक्त करता है। जब हम दूसरे जीवों से क्षमा मांगते हैं और उन्हें क्षमा करते हैं, तो हमारे हृदय में शांति का अनुभव होता है। यह विधि हमें वर्तमान क्षण (Present Moment) में जीना सिखाती है और भविष्य के लिए बेहतर आचरण का संकल्प दिलाती है। यह केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक उपचार (Psychological Treatment) भी है जो मानसिक भारीपन को दूर करता है।

प्रतिक्रमण (Pratikraman) के दौरान पढ़े जाने वाले सूत्रों में अहिंसा और मैत्री (Friendship and Non-violence) का संदेश छिपा होता है। "मैत्ती मे सव्व भूएसु" (सभी जीवों के साथ मेरी मित्रता हो) का भाव ही जैन दर्शन का आधार है। यह साधना हमें सिखाती है कि हम अपनी समस्याओं के लिए दूसरों को दोष देने के बजाय अपने भीतर झांकें। निरंतर अभ्यास से यह विधि आत्मा को कर्मों के बंधन (Bondage of Karma) से मुक्त कर मोक्ष की ओर ले जाती है। यह आत्म-अनुशासन (Self-discipline) का सर्वोच्च मार्ग है।

वर्तमान भागदौड़ भरी जिंदगी में प्रतिक्रमण (Pratikraman) का महत्व और भी बढ़ गया है। यह हमें कुछ समय रुककर अपने आचरण का मूल्यांकन (Evaluation of Conduct) करने का अवसर देता है। परिवार और समाज में शांति बनाए रखने के लिए यह क्षमा भाव अत्यंत आवश्यक है। भगवान महावीर (Lord Mahavir) ने इस मार्ग के जरिए सिखाया कि अपनी गलतियों को स्वीकार करना ही महानता की पहली सीढ़ी है। यह प्रक्रिया हमें एक बेहतर इंसान और जागरूक नागरिक (Conscious Citizen) बनाने में मदद करती है।

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जैन धर्म में प्रतिक्रमण (Pratikraman) एक ऐसी आध्यात्मिक प्रक्रिया है जिसका अर्थ है "पीछे लौटना" यानी अपनी गलतियों को सुधारना। यह आत्म-निरीक्षण (Introspection) की एक अद्भुत विधि है जिसमें साधक दिन भर या वर्ष भर में किए गए जाने-अनजाने पापों के लिए क्षमा मांगता है। प्रतिक्रमण का मुख्य उद्देश्य आत्मा पर चढ़े हुए कर्मों के मैल (Stain of Karma) को साफ करना है। जब हम अपनी भूलों को स्वीकार करते हैं, तो हमारे भीतर विनम्रता और शुद्धता (Humility and Purity) का उदय होता है।

प्रतिक्रमण (Pratikraman) की विधि में विभिन्न आसनों और कायोत्सर्ग (Meditation) का अभ्यास किया जाता है। साधक "मिच्छामि दुक्कड़म" (Michchhami Dukkadam) मंत्र का उच्चारण करता है, जिसका अर्थ है कि मेरे द्वारा किए गए सभी बुरे कार्य निष्फल हों। यह साधना सुबह और शाम दो समय की जाती है, जिसे 'देवसी' और 'रायी' प्रतिक्रमण कहा जाता है। इस प्रक्रिया में मन, वचन और काया (Mind, Speech and Body) की एकाग्रता आवश्यक है। यह अभ्यास मनुष्य को उसके नैतिक कर्तव्यों (Moral Duties) के प्रति सदैव सचेत रखता है।

आध्यात्मिक रूप से प्रतिक्रमण (Pratikraman) का महत्व यह है कि यह हमें अहंकार और राग-द्वेष (Attachment and Aversion) से मुक्त करता है। जब हम दूसरे जीवों से क्षमा मांगते हैं और उन्हें क्षमा करते हैं, तो हमारे हृदय में शांति का अनुभव होता है। यह विधि हमें वर्तमान क्षण (Present Moment) में जीना सिखाती है और भविष्य के लिए बेहतर आचरण का संकल्प दिलाती है। यह केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक उपचार (Psychological Treatment) भी है जो मानसिक भारीपन को दूर करता है।

प्रतिक्रमण (Pratikraman) के दौरान पढ़े जाने वाले सूत्रों में अहिंसा और मैत्री (Friendship and Non-violence) का संदेश छिपा होता है। "मैत्ती मे सव्व भूएसु" (सभी जीवों के साथ मेरी मित्रता हो) का भाव ही जैन दर्शन का आधार है। यह साधना हमें सिखाती है कि हम अपनी समस्याओं के लिए दूसरों को दोष देने के बजाय अपने भीतर झांकें। निरंतर अभ्यास से यह विधि आत्मा को कर्मों के बंधन (Bondage of Karma) से मुक्त कर मोक्ष की ओर ले जाती है। यह आत्म-अनुशासन (Self-discipline) का सर्वोच्च मार्ग है।

वर्तमान भागदौड़ भरी जिंदगी में प्रतिक्रमण (Pratikraman) का महत्व और भी बढ़ गया है। यह हमें कुछ समय रुककर अपने आचरण का मूल्यांकन (Evaluation of Conduct) करने का अवसर देता है। परिवार और समाज में शांति बनाए रखने के लिए यह क्षमा भाव अत्यंत आवश्यक है। भगवान महावीर (Lord Mahavir) ने इस मार्ग के जरिए सिखाया कि अपनी गलतियों को स्वीकार करना ही महानता की पहली सीढ़ी है। यह प्रक्रिया हमें एक बेहतर इंसान और जागरूक नागरिक (Conscious Citizen) बनाने में मदद करती है।
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