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विक्रम संवत (Vikram Samvat) का आरंभ अत्यंत गौरवशाली इतिहास से जुड़ा है, जिसकी स्थापना उज्जैन के प्रतापी राजा विक्रमादित्य (King Vikramaditya) ने की थी। ईसा पूर्व 57 में राजा विक्रमादित्य ने विदेशी आक्रमणकारियों, जिन्हें 'शक' (Sakas) कहा जाता था, को पराजित कर भारत भूमि को स्वतंत्र कराया था। इस महान विजय (Great Victory) की स्मृति में उन्होंने एक नया कालक्रम प्रारंभ किया, जो आज भी हिंदू गणना का आधार है। यह संवत साहस, न्याय और सुशासन (Good Governance) का प्रतीक माना जाता है।

शालिवाहन शक (Shalivahan Shaka) और विक्रम संवत में मुख्य अंतर उनके कालखंड और भौगोलिक प्रभाव का है। जहाँ विक्रम संवत उत्तर भारत में अधिक प्रचलित है, वहीं शालिवाहन शक दक्षिण भारत और महाराष्ट्र (Maharashtra and South India) में मुख्य आधार है। शक संवत की शुरुआत ईस्वी सन् 78 में राजा शालिवाहन की विजय के उपलक्ष्य में हुई थी। दोनों ही संवत भारतीय अस्मिता और विदेशी दासता से मुक्ति (Freedom from Bondage) के गौरव को रेखांकित करते हैं।

विक्रम संवत (Vikram Samvat) की गणना चंद्रमा की कलाओं (Lunar Phases) पर आधारित है, जिसे 'चंद्र गणना' कहा जाता है। इसमें प्रत्येक मास का निर्धारण शुक्ल और कृष्ण पक्ष के अनुसार होता है। ऐतिहासिक रूप से विक्रमादित्य ने अपनी प्रजा को ऋण मुक्त (Debt Free) किया था, जो उनके उदार और न्यायप्रिय चरित्र को दर्शाता है। यह संवत आज भी नेपाल का आधिकारिक कैलेंडर है और भारत के सांस्कृतिक जीवन (Cultural Life) का अभिन्न अंग बना हुआ है।

इन दोनों कैलेंडरों के बीच लगभग 135 वर्षों का अंतर पाया जाता है, जो ऐतिहासिक घटनाओं के कालक्रम (Chronology) को समझने में मदद करता है। विक्रम संवत का नव वर्ष चैत्र प्रतिपदा से शुरू होता है, जो वसंत के उल्लास को समेटे होता है। यह हमारी काल गणना की सूक्ष्मता (Precision of Time Calculation) को सिद्ध करता है जिसे ऋषि-मुनियों ने हज़ारों वर्ष पहले विकसित किया था। यह संवत हमारी सभ्यता की अमरता का प्रमाण है।

आज के समय में भी विक्रम संवत (Vikram Samvat) का उपयोग सभी धार्मिक अनुष्ठानों, विवाहों और पर्वों की तिथि निर्धारित करने में किया जाता है। राजा विक्रमादित्य की दानवीरता और न्यायप्रियता की कहानियाँ इस संवत को जन-जन के हृदय से जोड़ती हैं। यह हमें अपनी ऐतिहासिक विरासत (Historical Heritage) को संजोने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने के लिए प्रेरित करता है। यह संवत हमारी पहचान और स्वाभिमान का ध्वज है।

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विक्रम संवत (Vikram Samvat) का आरंभ अत्यंत गौरवशाली इतिहास से जुड़ा है, जिसकी स्थापना उज्जैन के प्रतापी राजा विक्रमादित्य (King Vikramaditya) ने की थी। ईसा पूर्व 57 में राजा विक्रमादित्य ने विदेशी आक्रमणकारियों, जिन्हें 'शक' (Sakas) कहा जाता था, को पराजित कर भारत भूमि को स्वतंत्र कराया था। इस महान विजय (Great Victory) की स्मृति में उन्होंने एक नया कालक्रम प्रारंभ किया, जो आज भी हिंदू गणना का आधार है। यह संवत साहस, न्याय और सुशासन (Good Governance) का प्रतीक माना जाता है।

शालिवाहन शक (Shalivahan Shaka) और विक्रम संवत में मुख्य अंतर उनके कालखंड और भौगोलिक प्रभाव का है। जहाँ विक्रम संवत उत्तर भारत में अधिक प्रचलित है, वहीं शालिवाहन शक दक्षिण भारत और महाराष्ट्र (Maharashtra and South India) में मुख्य आधार है। शक संवत की शुरुआत ईस्वी सन् 78 में राजा शालिवाहन की विजय के उपलक्ष्य में हुई थी। दोनों ही संवत भारतीय अस्मिता और विदेशी दासता से मुक्ति (Freedom from Bondage) के गौरव को रेखांकित करते हैं।

विक्रम संवत (Vikram Samvat) की गणना चंद्रमा की कलाओं (Lunar Phases) पर आधारित है, जिसे 'चंद्र गणना' कहा जाता है। इसमें प्रत्येक मास का निर्धारण शुक्ल और कृष्ण पक्ष के अनुसार होता है। ऐतिहासिक रूप से विक्रमादित्य ने अपनी प्रजा को ऋण मुक्त (Debt Free) किया था, जो उनके उदार और न्यायप्रिय चरित्र को दर्शाता है। यह संवत आज भी नेपाल का आधिकारिक कैलेंडर है और भारत के सांस्कृतिक जीवन (Cultural Life) का अभिन्न अंग बना हुआ है।

इन दोनों कैलेंडरों के बीच लगभग 135 वर्षों का अंतर पाया जाता है, जो ऐतिहासिक घटनाओं के कालक्रम (Chronology) को समझने में मदद करता है। विक्रम संवत का नव वर्ष चैत्र प्रतिपदा से शुरू होता है, जो वसंत के उल्लास को समेटे होता है। यह हमारी काल गणना की सूक्ष्मता (Precision of Time Calculation) को सिद्ध करता है जिसे ऋषि-मुनियों ने हज़ारों वर्ष पहले विकसित किया था। यह संवत हमारी सभ्यता की अमरता का प्रमाण है।

आज के समय में भी विक्रम संवत (Vikram Samvat) का उपयोग सभी धार्मिक अनुष्ठानों, विवाहों और पर्वों की तिथि निर्धारित करने में किया जाता है। राजा विक्रमादित्य की दानवीरता और न्यायप्रियता की कहानियाँ इस संवत को जन-जन के हृदय से जोड़ती हैं। यह हमें अपनी ऐतिहासिक विरासत (Historical Heritage) को संजोने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने के लिए प्रेरित करता है। यह संवत हमारी पहचान और स्वाभिमान का ध्वज है।
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