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हज़रत अली (Hazarat Ali) का बचपन पैगंबर मोहम्मद की छत्रछाया में बीता, जिसने उनके चरित्र निर्माण (Character Building) में सबसे बड़ी भूमिका निभाई। जब हज़रत अली छोटे थे, तब पैगंबर मोहम्मद ने उन्हें अपने पास बुला लिया और उनकी परवरिश (Upbringing) अपनी देखरेख में की। इस कारण अली ने कभी भी मूर्तियों की पूजा नहीं की और बचपन से ही एकेश्वरवाद (Monotheism) की शिक्षा प्राप्त की। पैगंबर के साथ उनका यह रिश्ता पिता-पुत्र और उस्ताद-शागिर्द (Teacher and Student) जैसा गहरा था।

हज़रत अली पहले ऐसे बालक थे जिन्होंने केवल दस वर्ष की आयु में इस्लाम धर्म (Islam Religion) स्वीकार किया। उन्होंने पैगंबर मोहम्मद के हर आदेश का बिना किसी संकोच के पालन किया। जब पैगंबर ने मक्का से मदीना हिजरत (Migration) की, तब हज़रत अली ने अपनी जान की परवाह न करते हुए पैगंबर के बिस्तर पर सोकर दुश्मनों को भ्रमित किया। यह उनके बचपन का सबसे बड़ा त्याग (Sacrifice) और वफादारी का प्रमाण था।

पैगंबर मोहम्मद (Prophet Muhammad) हज़रत अली से बहुत प्रेम करते थे और उन्हें अपना भाई व वसी (Successor) मानते थे। उन्होंने अली को वह सारा रूहानी ज्ञान (Spiritual Knowledge) प्रदान किया जो उन्हें अल्लाह की ओर से प्राप्त हुआ था। हज़रत अली ने पैगंबर के आचरण को अपने जीवन में पूरी तरह ढाल लिया था, जिससे वे पैगंबर के प्रतिबिंब (Reflection) की तरह दिखाई देते थे। इस गहरे रिश्ते ने उन्हें इस्लाम का सबसे मज़बूत स्तंभ (Strong Pillar) बना दिया।

बचपन से ही हज़रत अली (Ali ibn Abi Talib) में ज्ञान की प्यास और सत्य को जानने की ललक थी। वे पैगंबर की हर सभा में उपस्थित रहते और उनके शब्दों को अपने दिल में संजो लेते थे। पैगंबर ने उनके बारे में कहा था— "मैं और अली एक ही नूर (Light) से बने हैं।" यह कथन उनके बीच के रूहानी और भावनात्मक जुड़ाव की गहराई को स्पष्ट करता है। उनका बचपन ईश्वरीय प्रेम और वफादारी (Loyalty and Divine Love) की पाठशाला था।

हज़रत अली और पैगंबर के इस अटूट संबंध (Unbreakable Bond) के कारण ही अली को भविष्य में उम्मत का मार्गदर्शन करने की ज़िम्मेदारी मिली। उनके बचपन की कहानियाँ हमें सिखाती हैं कि अच्छे मार्गदर्शक (Mentor) का साथ मिलने पर व्यक्तित्व में कितना निखार आ सकता है। आज भी हज़रत अली के जन्मदिन (Ali's Birthday) पर उनके और पैगंबर के बीच के इस महान प्रेम और सम्मान को याद कर लोग भावुक हो जाते हैं। यह रिश्ता वफादारी की सर्वोच्च मिसाल है।

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हज़रत अली (Hazarat Ali) का बचपन पैगंबर मोहम्मद की छत्रछाया में बीता, जिसने उनके चरित्र निर्माण (Character Building) में सबसे बड़ी भूमिका निभाई। जब हज़रत अली छोटे थे, तब पैगंबर मोहम्मद ने उन्हें अपने पास बुला लिया और उनकी परवरिश (Upbringing) अपनी देखरेख में की। इस कारण अली ने कभी भी मूर्तियों की पूजा नहीं की और बचपन से ही एकेश्वरवाद (Monotheism) की शिक्षा प्राप्त की। पैगंबर के साथ उनका यह रिश्ता पिता-पुत्र और उस्ताद-शागिर्द (Teacher and Student) जैसा गहरा था।

हज़रत अली पहले ऐसे बालक थे जिन्होंने केवल दस वर्ष की आयु में इस्लाम धर्म (Islam Religion) स्वीकार किया। उन्होंने पैगंबर मोहम्मद के हर आदेश का बिना किसी संकोच के पालन किया। जब पैगंबर ने मक्का से मदीना हिजरत (Migration) की, तब हज़रत अली ने अपनी जान की परवाह न करते हुए पैगंबर के बिस्तर पर सोकर दुश्मनों को भ्रमित किया। यह उनके बचपन का सबसे बड़ा त्याग (Sacrifice) और वफादारी का प्रमाण था।

पैगंबर मोहम्मद (Prophet Muhammad) हज़रत अली से बहुत प्रेम करते थे और उन्हें अपना भाई व वसी (Successor) मानते थे। उन्होंने अली को वह सारा रूहानी ज्ञान (Spiritual Knowledge) प्रदान किया जो उन्हें अल्लाह की ओर से प्राप्त हुआ था। हज़रत अली ने पैगंबर के आचरण को अपने जीवन में पूरी तरह ढाल लिया था, जिससे वे पैगंबर के प्रतिबिंब (Reflection) की तरह दिखाई देते थे। इस गहरे रिश्ते ने उन्हें इस्लाम का सबसे मज़बूत स्तंभ (Strong Pillar) बना दिया।

बचपन से ही हज़रत अली (Ali ibn Abi Talib) में ज्ञान की प्यास और सत्य को जानने की ललक थी। वे पैगंबर की हर सभा में उपस्थित रहते और उनके शब्दों को अपने दिल में संजो लेते थे। पैगंबर ने उनके बारे में कहा था— "मैं और अली एक ही नूर (Light) से बने हैं।" यह कथन उनके बीच के रूहानी और भावनात्मक जुड़ाव की गहराई को स्पष्ट करता है। उनका बचपन ईश्वरीय प्रेम और वफादारी (Loyalty and Divine Love) की पाठशाला था।

हज़रत अली और पैगंबर के इस अटूट संबंध (Unbreakable Bond) के कारण ही अली को भविष्य में उम्मत का मार्गदर्शन करने की ज़िम्मेदारी मिली। उनके बचपन की कहानियाँ हमें सिखाती हैं कि अच्छे मार्गदर्शक (Mentor) का साथ मिलने पर व्यक्तित्व में कितना निखार आ सकता है। आज भी हज़रत अली के जन्मदिन (Ali's Birthday) पर उनके और पैगंबर के बीच के इस महान प्रेम और सम्मान को याद कर लोग भावुक हो जाते हैं। यह रिश्ता वफादारी की सर्वोच्च मिसाल है।
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