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ईद उल फ़ित्र की नमाज़ (Eid ul Fitr Namaz) साल में दो बार पढ़ी जाने वाली विशेष प्रार्थना है, जो सूर्योदय के कुछ समय बाद जमात के साथ अदा की जाती है। इस नमाज़ (Prayer) में दो रकात होती हैं और इसमें सामान्य नमाज़ के मुकाबले छह अतिरिक्त तकबीर (Additional Takbeers) कही जाती हैं। नमाज़ शुरू करने से पहले नीयत (Intention) की जाती है और इमाम के पीछे खड़े होकर हाथों को कानों तक उठाकर अल्लाहू अकबर कहा जाता है। पहली रकात में सना के बाद तीन तकबीरें होती हैं, जिनमें हाथ उठाकर छोड़ दिए जाते हैं और तीसरी के बाद बाँध लिए जाते हैं।

नमाज़ (Prayer) की दूसरी रकात में कुरान की सूरह पढ़ने के बाद रुकू में जाने से पहले फिर से तीन अतिरिक्त तकबीरें (Takbeers) कही जाती हैं। इन तीनों में हाथ उठाकर छोड़ दिए जाते हैं और चौथी तकबीर पर बिना हाथ उठाए रुकू (Bowing) में जाया जाता है। नमाज़ पूरी होने के बाद इमाम साहब खुतबा (Sermon) देते हैं, जिसे सुनना वाजिब और अत्यंत अनिवार्य माना जाता है। खुतबे के बाद सामूहिक दुआ (Collective Supplication) की जाती है, जिसमें मुल्क की सलामती और बरकत की कामना होती है।

ईदगाह (Eidgah) में नमाज़ पढ़ने का महत्व बहुत अधिक है क्योंकि यहाँ शहर के हज़ारों मुसलमान एक साथ एक ही सफ (Row) में खड़े होते हैं। यह दृश्य एकता और भाईचारे (Unity and Brotherhood) का सबसे बड़ा उदाहरण पेश करता है। ईदगाह एक खुला मैदान होता है जहाँ ऊँच-नीच और अमीरी-गरीबी का भेद मिट जाता है। इस्लाम में सुन्नत (Sunnah) है कि ईद की नमाज़ खुले स्थान पर पढ़ी जाए ताकि मुस्लिम समुदाय की मजबूती और एकजुटता (Solidarity) का प्रदर्शन हो सके।

नमाज़ (Namaz) के लिए जाते समय एक रास्ते से जाना और दूसरे रास्ते से वापस आना पैगंबर साहब की सुन्नत (Tradition of Prophet) है। रास्ते में चलते हुए धीमे स्वर में 'तक्बीर-ए-तशरीक' पढ़ना चाहिए। नमाज़ से पहले गुसल (Ritual Bath) करना, नए या साफ कपड़े पहनना और इत्र (Perfume) लगाना मुस्तहब है। यह तैयारी अल्लाह के प्रति सम्मान और त्यौहार की खुशी (Joy of Festival) को प्रकट करती है। नमाज़ के बाद एक-दूसरे से गले मिलना और 'ईद मुबारक' कहना सामाजिक सौहार्द को बढ़ाता है।

ईद उल फ़ित्र (Eid ul Fitr) की इस विशेष इबादत से पहले फितरा (Charity) देना ज़रूरी है ताकि गरीब लोग भी त्यौहार की खुशियों में शामिल हो सकें। ईदगाह में नमाज़ (Prayer in Eidgah) के बाद छोटे बच्चों को ईदी (Eid Gift) दी जाती है, जिससे वातावरण में उल्लास भर जाता है। यह प्रार्थना केवल एक रस्म नहीं, बल्कि एक महीने के कठिन उपवास (Fasting) की सफलता का आभार व्यक्त करने का तरीका है। अल्लाह की बारगाह में सिर झुकाकर मोमिन अपने गुनाहों की माफी और नेक जीवन की राह मांगते हैं।

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ईद उल फ़ित्र की नमाज़ (Eid ul Fitr Namaz) साल में दो बार पढ़ी जाने वाली विशेष प्रार्थना है, जो सूर्योदय के कुछ समय बाद जमात के साथ अदा की जाती है। इस नमाज़ (Prayer) में दो रकात होती हैं और इसमें सामान्य नमाज़ के मुकाबले छह अतिरिक्त तकबीर (Additional Takbeers) कही जाती हैं। नमाज़ शुरू करने से पहले नीयत (Intention) की जाती है और इमाम के पीछे खड़े होकर हाथों को कानों तक उठाकर अल्लाहू अकबर कहा जाता है। पहली रकात में सना के बाद तीन तकबीरें होती हैं, जिनमें हाथ उठाकर छोड़ दिए जाते हैं और तीसरी के बाद बाँध लिए जाते हैं।

नमाज़ (Prayer) की दूसरी रकात में कुरान की सूरह पढ़ने के बाद रुकू में जाने से पहले फिर से तीन अतिरिक्त तकबीरें (Takbeers) कही जाती हैं। इन तीनों में हाथ उठाकर छोड़ दिए जाते हैं और चौथी तकबीर पर बिना हाथ उठाए रुकू (Bowing) में जाया जाता है। नमाज़ पूरी होने के बाद इमाम साहब खुतबा (Sermon) देते हैं, जिसे सुनना वाजिब और अत्यंत अनिवार्य माना जाता है। खुतबे के बाद सामूहिक दुआ (Collective Supplication) की जाती है, जिसमें मुल्क की सलामती और बरकत की कामना होती है।

ईदगाह (Eidgah) में नमाज़ पढ़ने का महत्व बहुत अधिक है क्योंकि यहाँ शहर के हज़ारों मुसलमान एक साथ एक ही सफ (Row) में खड़े होते हैं। यह दृश्य एकता और भाईचारे (Unity and Brotherhood) का सबसे बड़ा उदाहरण पेश करता है। ईदगाह एक खुला मैदान होता है जहाँ ऊँच-नीच और अमीरी-गरीबी का भेद मिट जाता है। इस्लाम में सुन्नत (Sunnah) है कि ईद की नमाज़ खुले स्थान पर पढ़ी जाए ताकि मुस्लिम समुदाय की मजबूती और एकजुटता (Solidarity) का प्रदर्शन हो सके।

नमाज़ (Namaz) के लिए जाते समय एक रास्ते से जाना और दूसरे रास्ते से वापस आना पैगंबर साहब की सुन्नत (Tradition of Prophet) है। रास्ते में चलते हुए धीमे स्वर में 'तक्बीर-ए-तशरीक' पढ़ना चाहिए। नमाज़ से पहले गुसल (Ritual Bath) करना, नए या साफ कपड़े पहनना और इत्र (Perfume) लगाना मुस्तहब है। यह तैयारी अल्लाह के प्रति सम्मान और त्यौहार की खुशी (Joy of Festival) को प्रकट करती है। नमाज़ के बाद एक-दूसरे से गले मिलना और 'ईद मुबारक' कहना सामाजिक सौहार्द को बढ़ाता है।

ईद उल फ़ित्र (Eid ul Fitr) की इस विशेष इबादत से पहले फितरा (Charity) देना ज़रूरी है ताकि गरीब लोग भी त्यौहार की खुशियों में शामिल हो सकें। ईदगाह में नमाज़ (Prayer in Eidgah) के बाद छोटे बच्चों को ईदी (Eid Gift) दी जाती है, जिससे वातावरण में उल्लास भर जाता है। यह प्रार्थना केवल एक रस्म नहीं, बल्कि एक महीने के कठिन उपवास (Fasting) की सफलता का आभार व्यक्त करने का तरीका है। अल्लाह की बारगाह में सिर झुकाकर मोमिन अपने गुनाहों की माफी और नेक जीवन की राह मांगते हैं।
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