ज़कात-उल-फ़ित्र (Zakat ul Fitr) और वार्षिक ज़कात में बुनियादी अंतर उनके उद्देश्य और समय का है। वार्षिक ज़कात (Annual Zakat) संपत्ति की एक निश्चित मात्रा (Nisab) पर साल पूरा होने के बाद दी जाती है, जबकि ज़कात-उल-फ़ित्र केवल रमज़ान के महीने में ईद से पहले दी जाती है। ज़कात-उल-फ़ित्र हर उस व्यक्ति पर अनिवार्य है जिसके पास ईद के दिन अपनी ज़रूरत से ज़्यादा भोजन उपलब्ध हो। यह दान (Donation) छोटे-बड़े, अमीर-गरीब और यहाँ तक कि नवजात शिशुओं की ओर से भी दिया जाता है।
वितरण के नियमों (Rules of Distribution) की बात करें तो ज़कात-उल-फ़ित्र का हकदार वही है जो वास्तव में निर्धन और असहाय (Poor and Needy) हो। इसे नकद पैसे (Cash) के रूप में देना आज के समय में अधिक व्यावहारिक माना जाता है ताकि प्राप्तकर्ता अपनी ज़रूरत के अनुसार वस्तुएं खरीद सके। हालाँकि, पारंपरिक रूप से अनाज (Grains) देना भी प्रचलित है। इसे अपने क्षेत्र के स्थानीय गरीबों को प्राथमिकता (Priority) देते हुए देना चाहिए। यह दान हमारे धन को पवित्र करता है और समाज के निचले तबके की मदद करता है।
ज़कात-उल-फ़ित्र (Zakat ul Fitr) की अदायगी में देरी नहीं करनी चाहिए। इसका सबसे अच्छा समय ईद की चाँद रात (Chand Raat) या ईद की सुबह नमाज़ से पहले का है। यदि कोई व्यक्ति यात्रा पर है, तो उसे अपने घर या उस स्थान पर फ़ितरा (Fitra) अदा करना चाहिए जहाँ वह मौजूद है। यह दान सामाजिक जिम्मेदारी (Social Responsibility) का एहसास कराता है। यह सुनिश्चित करता है कि ईद की खुशियाँ किसी एक वर्ग तक सीमित न रहकर पूरे समाज में समान रूप से फैलें।
वार्षिक ज़कात (Yearly Zakat) का उपयोग बड़े सामाजिक कार्यों जैसे अस्पताल या स्कूल बनाने में हो सकता है, लेकिन फ़ितरा (Fitra) विशेष रूप से तात्कालिक भोजन और वस्त्र (Food and Clothing) की ज़रूरत पूरी करने के लिए होता है। इसे 'सदक़ा-ए-फ़ित्र' भी कहा जाता है क्योंकि यह मानव अस्तित्व (Fitrat) का दान है। यह हमारे भीतर मानवीय संवेदनाओं (Human Sensitivities) को जीवित रखता है। ज़कात-उल-फ़ित्र की अदायगी से रोज़े की छोटी-मोटी त्रुटियाँ माफ हो जाती हैं और इबादत मुकम्मल होती है।
मस्जिदों के इमाम और जानकार लोग फ़ितरा की सही मात्रा (Exact Quantity) के बारे में जानकारी देते हैं। इसे देने से व्यक्ति के मन में अहंकार कम होता है और वह अल्लाह की दी हुई नेमतों (Blessings) के प्रति शुक्रगुज़ार बनता है। ज़कात-उल-फ़ित्र का यह नियम समाज में आर्थिक संतुलन (Economic Balance) बनाए रखने में मदद करता है। यह एक ऐसा आध्यात्मिक निवेश (Spiritual Investment) है जिसका प्रतिफल इस दुनिया और आख़िरत दोनों में मिलता है। यह दान एकता का प्रतीक है।