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तरावीह की नमाज़ (Taraweeh Namaz) रमज़ान के महीने की एक विशेष सुन्नत इबादत है जो ईशा की नमाज़ के बाद और वित्र से पहले जमात के साथ पढ़ी जाती है। इस नमाज़ (Prayer) का मुख्य उद्देश्य पूरे महीने में पवित्र कुरान का मुकम्मल पाठ सुनना और अल्लाह की रज़ा हासिल करना है। तरावीह शब्द का अर्थ 'आराम करना' (Taking Rest) होता है, क्योंकि हर चार रकात के बाद कुछ देर बैठकर तस्बीह पढ़ी जाती है और शरीर को विश्राम दिया जाता है। यह नमाज़ मोमिन के दिल में सब्र और अनुशासन (Patience and Discipline) पैदा करती है, जिससे उसकी रूहानी ताक़त बढ़ती है।

नमाज़ (Prayer) पढ़ने के तरीके में आमतौर पर बीस रकात (Twenty Rakats) शामिल होती हैं, जिन्हें दो-दो रकात करके अदा किया जाता है। मस्जिदों में हाफ़िज़ साहब कुरान की तिलावत (Recitation of Quran) करते हैं, जिसे सभी नमाज़ी बड़े ध्यान और अदब से सुनते हैं। तरावीह की नमाज़ पढ़ना केवल पुरुषों के लिए ही नहीं, बल्कि घर की सीमाओं में महिलाओं (Women at Home) के लिए भी अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। यह रात की इबादत इंसान के दिन भर के रोज़े की थकान को मिटाकर उसे एक रूहानी सुकून (Spiritual Peace) प्रदान करती है।

धार्मिक रूप से तरावीह (Taraweeh) पढ़ने का सवाब बहुत अधिक है क्योंकि पैगंबर साहब ने फ़रमाया है कि जो व्यक्ति रमज़ान की रातों में ईमान और उम्मीद के साथ इबादत करेगा, उसके पिछले गुनाह माफ (Forgiveness of Sins) कर दिए जाएंगे। यह नमाज़ मुसलमानों के बीच सामाजिक एकता (Social Unity) का भी बड़ा माध्यम है, जहाँ मोहल्ले के सभी लोग एक साथ खड़े होकर अल्लाह की बारगाह में सिर झुकाते हैं। तरावीह की पाबंदी करने से इंसान का मन बुराइयों से हटकर नेकी (Righteousness) की ओर अग्रसर होता है।

तरावीह की नमाज़ (Taraweeh Namaz) में कुरान सुनने से दिल की सफाई होती है और अल्लाह का कलाम सीधे रूह पर असर करता है। बहुत से लोग काम की व्यस्तता के बावजूद इस नमाज़ के लिए समय निकालते हैं, जो उनके अटूट ईमान (Firm Faith) को दर्शाता है। यदि कोई पूरा कुरान नहीं सुन पाता, तो वह छोटी सूरतों के साथ भी यह नमाज़ अदा कर सकता है। रमज़ान की बरकतें (Blessings of Ramzan) समेटने के लिए तरावीह की पाबंदी को एक अनिवार्य हिस्सा माना जाता है।

तरावीह (Taraweeh) का समापन अक्सर रमज़ान के आखिरी दिनों में कुरान मुकम्मल होने के साथ होता है, जिसे 'ख़त्म-ए-कुरान' (Completion of Quran) की महफ़िल कहा जाता है। इस अवसर पर विशेष दुआएँ माँगी जाती हैं और शीरीनी बाँटी जाती है। यह नमाज़ (Namaz) हमें सिखाती है कि इबादत में निरंतरता और लगन ही अल्लाह की निकटता (Closeness to Allah) प्राप्त करने का एकमात्र रास्ता है। तरावीह की मिठास वही समझ सकता है जो पूरी रात खुदा की याद में खड़ा रहता है।

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तरावीह की नमाज़ (Taraweeh Namaz) रमज़ान के महीने की एक विशेष सुन्नत इबादत है जो ईशा की नमाज़ के बाद और वित्र से पहले जमात के साथ पढ़ी जाती है। इस नमाज़ (Prayer) का मुख्य उद्देश्य पूरे महीने में पवित्र कुरान का मुकम्मल पाठ सुनना और अल्लाह की रज़ा हासिल करना है। तरावीह शब्द का अर्थ 'आराम करना' (Taking Rest) होता है, क्योंकि हर चार रकात के बाद कुछ देर बैठकर तस्बीह पढ़ी जाती है और शरीर को विश्राम दिया जाता है। यह नमाज़ मोमिन के दिल में सब्र और अनुशासन (Patience and Discipline) पैदा करती है, जिससे उसकी रूहानी ताक़त बढ़ती है।

नमाज़ (Prayer) पढ़ने के तरीके में आमतौर पर बीस रकात (Twenty Rakats) शामिल होती हैं, जिन्हें दो-दो रकात करके अदा किया जाता है। मस्जिदों में हाफ़िज़ साहब कुरान की तिलावत (Recitation of Quran) करते हैं, जिसे सभी नमाज़ी बड़े ध्यान और अदब से सुनते हैं। तरावीह की नमाज़ पढ़ना केवल पुरुषों के लिए ही नहीं, बल्कि घर की सीमाओं में महिलाओं (Women at Home) के लिए भी अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। यह रात की इबादत इंसान के दिन भर के रोज़े की थकान को मिटाकर उसे एक रूहानी सुकून (Spiritual Peace) प्रदान करती है।

धार्मिक रूप से तरावीह (Taraweeh) पढ़ने का सवाब बहुत अधिक है क्योंकि पैगंबर साहब ने फ़रमाया है कि जो व्यक्ति रमज़ान की रातों में ईमान और उम्मीद के साथ इबादत करेगा, उसके पिछले गुनाह माफ (Forgiveness of Sins) कर दिए जाएंगे। यह नमाज़ मुसलमानों के बीच सामाजिक एकता (Social Unity) का भी बड़ा माध्यम है, जहाँ मोहल्ले के सभी लोग एक साथ खड़े होकर अल्लाह की बारगाह में सिर झुकाते हैं। तरावीह की पाबंदी करने से इंसान का मन बुराइयों से हटकर नेकी (Righteousness) की ओर अग्रसर होता है।

तरावीह की नमाज़ (Taraweeh Namaz) में कुरान सुनने से दिल की सफाई होती है और अल्लाह का कलाम सीधे रूह पर असर करता है। बहुत से लोग काम की व्यस्तता के बावजूद इस नमाज़ के लिए समय निकालते हैं, जो उनके अटूट ईमान (Firm Faith) को दर्शाता है। यदि कोई पूरा कुरान नहीं सुन पाता, तो वह छोटी सूरतों के साथ भी यह नमाज़ अदा कर सकता है। रमज़ान की बरकतें (Blessings of Ramzan) समेटने के लिए तरावीह की पाबंदी को एक अनिवार्य हिस्सा माना जाता है।

तरावीह (Taraweeh) का समापन अक्सर रमज़ान के आखिरी दिनों में कुरान मुकम्मल होने के साथ होता है, जिसे 'ख़त्म-ए-कुरान' (Completion of Quran) की महफ़िल कहा जाता है। इस अवसर पर विशेष दुआएँ माँगी जाती हैं और शीरीनी बाँटी जाती है। यह नमाज़ (Namaz) हमें सिखाती है कि इबादत में निरंतरता और लगन ही अल्लाह की निकटता (Closeness to Allah) प्राप्त करने का एकमात्र रास्ता है। तरावीह की मिठास वही समझ सकता है जो पूरी रात खुदा की याद में खड़ा रहता है।
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