लैलतुल क़द्र (Laylat ul Qadr) रमज़ान के आखिरी अशरे यानी अंतिम दस दिनों की विषम रातों (Odd Nights) में से एक अत्यंत गौरवशाली रात है। कुरान के अनुसार, यह एक रात हज़ारों महीनों की इबादत (Worship of Thousand Months) से भी अधिक उत्तम है। इसी रात में अल्लाह ने कुरान को स्वर्ग से पृथ्वी पर उतारने की प्रक्रिया प्रारंभ की थी। इस रात की महानता (Greatness of Night) का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि इसमें फरिश्ते और हज़रत जिब्रील ज़मीन पर उतरते हैं और इबादत करने वालों के लिए सलामती की दुआ करते हैं।
शब-ए-क़द्र (Shab e Qadr) को तलाशने के लिए मुसलमान 21वीं, 23वीं, 25वीं, 27वीं और 29वीं रातों में पूरी रात जागकर इबादत (Night Vigil) करते हैं। इस रात में जो भी जायज़ दुआ माँगी जाती है, अल्लाह उसे अपनी रहमत से स्वीकार (Acceptance of Prayer) कर लेता है। यह तक़दीर बदलने वाली रात (Night of Destiny) मानी जाती है, जहाँ अगले एक साल के लिए बंदों के रिज़्क और जीवन का फैसला किया जाता है। इसलिए इस रात में रो-रोकर अपने गुनाहों की माफी माँगना और नेक हिदायत चाहना हर मोमिन की प्राथमिकता होती है।
धार्मिक ग्रंथों (Religious Texts) में उल्लेख है कि जो इस रात की बरकतों से वंचित रहा, वह हर भलाई से वंचित रह गया। लोग इस रात में नफिल नमाज़ (Nafl Namaz), कुरान की तिलावत और ज़िक्र-ओ-अज़कार (Remembrance of Allah) की कसरत करते हैं। मस्जिदों में चराग़ां किया जाता है और वातावरण पूरी तरह रूहानी (Spiritual Atmosphere) हो जाता है। लैलतुल क़द्र (Laylat ul Qadr) हमें यह सिखाती है कि अल्लाह की रहमत का दरवाज़ा हमेशा खुला है, बस हमें उसे सच्चे दिल से तलाशने की ज़रूरत है।
इस रात में तौबा (Repentance) का विशेष महत्व है, क्योंकि सच्चे मन से की गई तौबा इंसान को नवजात शिशु की तरह मासूम बना देती है। शब-ए-क़द्र (Night of Power) में 'अल्लाहुम्मा इन्नका अफ़ुव्वुन तुहिब्बुल अफ़वा फ़ाफ़ु अन्नी' वाली दुआ पढ़ना पैगंबर साहब की सुन्नत है। यह रात मानवता के लिए शांति और सुरक्षा (Peace and Safety) का पैगाम लेकर आती है। जो लोग पूरी रात इबादत में गुज़ारते हैं, उनके चेहरों पर एक रूहानी नूर (Spiritual Light) और दिल में सुकून महसूस होता है।
लैलतुल क़द्र (Laylat ul Qadr) का असली उद्देश्य इंसान को दुनिया की मोह-माया से हटाकर खुदा की इबादत (Worship of God) में लगाना है। यह रात हमें अवसर देती है कि हम अपने जीवन के उद्देश्यों पर पुनर्विचार करें और स्वयं को एक बेहतर इंसान (Better Human Being) के रूप में ढालें। शब-ए-क़द्र की सुबह तक फरिश्तों का दुआ करना इस बात का प्रमाण है कि अल्लाह अपने बंदों से कितना प्रेम करता है। यह रात हर मुसलमान के लिए एक अनमोल उपहार (Precious Gift) के समान है।