ईद उल फ़ित्र (Eid ul Fitr) का असली मकसद केवल खुद खुशियाँ मनाना नहीं, बल्कि समाज के कमज़ोर वर्ग को भी उस खुशी में शामिल करना है। ईद दान (Eid Charity) जिसे ज़कात और फ़ितरा कहा जाता है, इस्लाम के बुनियादी स्तंभों में से एक है। यह दान (Donation) अनिवार्य रूप से ईद की नमाज़ से पहले दिया जाता है ताकि गरीब परिवार भी अपने लिए नए कपड़े और अच्छा भोजन (Food and Clothing) जुटा सकें। यह प्रक्रिया इंसान के भीतर संवेदनशीलता और दूसरों के प्रति दया (Compassion and Kindness) का भाव पैदा करती है।
धार्मिक रूप से मान्यता है कि बिना दान (Charity) के रोज़ेदार की इबादत मुकम्मल नहीं होती। अपनी कमाई का एक निश्चित हिस्सा ज़रूरतमंदों को देना न केवल पुण्य का काम है, बल्कि यह आर्थिक संतुलन (Economic Balance) बनाए रखने का एक ईश्वरीय तरीका है। जब एक अमीर व्यक्ति किसी अनाथ या विधवा की मदद करता है, तो समाज में असुरक्षा की भावना कम होती है। ईद दान (Eid Charity) वास्तव में मानवता की सेवा (Service to Humanity) का सबसे बड़ा प्रमाण है जो हर मुसलमान की ज़िम्मेदारी है।
दान (Almsgiving) देने से व्यक्ति के मन से लालच और स्वार्थ की भावना समाप्त हो जाती है। यह रस्म हमें यह याद दिलाती है कि हमारे पास जो कुछ भी है, वह ईश्वर की देन है और उस पर सबका अधिकार है। बहुत से लोग गुप्त दान (Secret Charity) करना पसंद करते हैं ताकि लेने वाले के आत्म-सम्मान (Self-respect) को ठेस न पहुँचे। यह विनम्रता और नैतिकता (Morality and Humility) का वह पाठ है जो रमज़ान का महीना हमें सिखाता है।
भारत में बहुत से संगठन और व्यक्ति ईद के मौके पर विशेष दान अभियान (Charity Campaigns) चलाते हैं। अस्पतालों में फल बाँटना, जेल के कैदियों को नए वस्त्र देना और सड़कों पर रहने वालों के लिए भोजन (Community Kitchen) का प्रबंध करना इस त्यौहार की गरिमा को बढ़ाता है। यह दान केवल पैसों तक सीमित नहीं है, बल्कि अपना समय और श्रम देना भी एक प्रकार की चैरिटी (Kind of Charity) है। खुशियाँ बाँटने से ही बढ़ती हैं, और यही इस त्यौहार का मूल मंत्र है।
अंततः, ईद दान (Eid Charity) हमें एक ज़िम्मेदार नागरिक और बेहतर इंसान बनाता है। जब हम किसी के चेहरे पर मुस्कान लाते हैं, तो वह सुकून दुनिया की हर दौलत से बड़ा होता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और समाज को जोड़ने का काम करती है। ईद की नमाज़ (Eid Prayer) के बाद जब लोग गले मिलते हैं, तो दान देने की संतुष्टि उनके चेहरे पर एक रूहानी नूर (Spiritual Glow) के रूप में दिखाई देती है। यह निस्वार्थ सेवा ही वास्तविक धर्म है।