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इफ्तार (Iftar) वह समय है जब सूरज ढलने के बाद रोज़ेदार अपना रोज़ा खोलता है, और यह दुआओं की कबूलियत (Acceptance of Prayers) का खास वक्त होता है। सुन्नत (Sunnah) के अनुसार इफ्तार में जल्दी करना चाहिए और इसे खजूर (Dates) या सादे पानी से शुरू करना बेहतर माना जाता है। खजूर से रोज़ा खोलना न केवल धार्मिक रूप से उत्तम है, बल्कि यह शरीर को तत्काल ऊर्जा (Immediate Energy) प्रदान करने का एक वैज्ञानिक तरीका भी है। इफ्तार के वक्त का इंतज़ार रोज़ेदार के सब्र (Patience) की पराकाष्ठा को दर्शाता है।

इफ्तार (Roza Iftar) से ठीक पहले की गई दुआएं कभी खाली नहीं जातीं, इसलिए इस वक्त को इबादत और ज़िक्र (Remembrance of God) में बिताना चाहिए। यह वह घड़ी है जब अल्लाह अपने बंदों पर रहमत (Mercy) की बारिश करता है और उनकी जायज़ मुरादें पूरी करता है। परिवार के सभी सदस्यों का एक साथ दस्तरखान पर बैठना आपसी मोहब्बत और एकता (Unity and Love) को बढ़ावा देता है। इफ्तार केवल भोजन करने का नाम नहीं, बल्कि खुदा की नेमतों (Bounties of God) के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का क्षण है।

समाज में इफ्तार (Roza Iftar) का एक बड़ा पहलू 'इफ्तार पार्टियों' का आयोजन है, जहाँ अमीर और गरीब एक ही कतार में बैठकर रोज़ा खोलते हैं। किसी दूसरे रोज़ेदार को इफ्तार कराने का सवाब (Reward) बहुत अज़ीम है, जिससे सामाजिक भाईचारा (Social Brotherhood) मज़बूत होता है। भारत में इफ्तार के समय मस्जिदों और घरों में तरह-तरह के पकवान (Dishes) बनाए जाते हैं, जो सांस्कृतिक विविधता (Cultural Diversity) को भी दर्शाते हैं। यह सामूहिक इफ्तार (Collective Iftar) समाज में शांति और सौहार्द का संदेश फैलाता है।

इफ्तार (Iftar) के बाद मगरिब की नमाज़ अदा करना फर्ज़ है, जो रोज़ेदार को आलस्य से बचाकर इबादत की ओर ले जाता है। अधिक भोजन (Overeating) से बचना चाहिए ताकि रात की तरावीह और तहज्जुद की नमाज़ों में एकाग्रता बनी रहे। इफ्तार के समय की सादगी (Simplicity) इस बात की याद दिलाती है कि हम दुनिया की नेमतों के मालिक नहीं, बल्कि खुदा के मोहताज हैं। यह वक्त इंसान को अपनी कमज़ोरी और खुदा की किब्रियाई (Greatness of God) का अहसास कराने वाला होता है।

अंत में, इफ्तार (Roza Iftar) की खुशी उस रूहानी कामयाबी की खुशी है जो एक मोमिन पूरे दिन के संघर्ष के बाद प्राप्त करता है। यह शाम हमें यह सबक देती है कि हर मुश्किल (Hardship) के बाद आसानी और इनाम (Reward) है। इफ्तार की बरकतें केवल दस्तरखान तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि वे इंसान के पूरे अस्तित्व को नूरानी (Radiant) बना देती हैं। इफ्तार का सही तरीका अपनाकर हम न केवल शारीरिक स्वास्थ्य (Physical Health) बल्कि रूहानी तरक्की भी हासिल कर सकते हैं।

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इफ्तार (Iftar) वह समय है जब सूरज ढलने के बाद रोज़ेदार अपना रोज़ा खोलता है, और यह दुआओं की कबूलियत (Acceptance of Prayers) का खास वक्त होता है। सुन्नत (Sunnah) के अनुसार इफ्तार में जल्दी करना चाहिए और इसे खजूर (Dates) या सादे पानी से शुरू करना बेहतर माना जाता है। खजूर से रोज़ा खोलना न केवल धार्मिक रूप से उत्तम है, बल्कि यह शरीर को तत्काल ऊर्जा (Immediate Energy) प्रदान करने का एक वैज्ञानिक तरीका भी है। इफ्तार के वक्त का इंतज़ार रोज़ेदार के सब्र (Patience) की पराकाष्ठा को दर्शाता है।

इफ्तार (Roza Iftar) से ठीक पहले की गई दुआएं कभी खाली नहीं जातीं, इसलिए इस वक्त को इबादत और ज़िक्र (Remembrance of God) में बिताना चाहिए। यह वह घड़ी है जब अल्लाह अपने बंदों पर रहमत (Mercy) की बारिश करता है और उनकी जायज़ मुरादें पूरी करता है। परिवार के सभी सदस्यों का एक साथ दस्तरखान पर बैठना आपसी मोहब्बत और एकता (Unity and Love) को बढ़ावा देता है। इफ्तार केवल भोजन करने का नाम नहीं, बल्कि खुदा की नेमतों (Bounties of God) के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का क्षण है।

समाज में इफ्तार (Roza Iftar) का एक बड़ा पहलू 'इफ्तार पार्टियों' का आयोजन है, जहाँ अमीर और गरीब एक ही कतार में बैठकर रोज़ा खोलते हैं। किसी दूसरे रोज़ेदार को इफ्तार कराने का सवाब (Reward) बहुत अज़ीम है, जिससे सामाजिक भाईचारा (Social Brotherhood) मज़बूत होता है। भारत में इफ्तार के समय मस्जिदों और घरों में तरह-तरह के पकवान (Dishes) बनाए जाते हैं, जो सांस्कृतिक विविधता (Cultural Diversity) को भी दर्शाते हैं। यह सामूहिक इफ्तार (Collective Iftar) समाज में शांति और सौहार्द का संदेश फैलाता है।

इफ्तार (Iftar) के बाद मगरिब की नमाज़ अदा करना फर्ज़ है, जो रोज़ेदार को आलस्य से बचाकर इबादत की ओर ले जाता है। अधिक भोजन (Overeating) से बचना चाहिए ताकि रात की तरावीह और तहज्जुद की नमाज़ों में एकाग्रता बनी रहे। इफ्तार के समय की सादगी (Simplicity) इस बात की याद दिलाती है कि हम दुनिया की नेमतों के मालिक नहीं, बल्कि खुदा के मोहताज हैं। यह वक्त इंसान को अपनी कमज़ोरी और खुदा की किब्रियाई (Greatness of God) का अहसास कराने वाला होता है।

अंत में, इफ्तार (Roza Iftar) की खुशी उस रूहानी कामयाबी की खुशी है जो एक मोमिन पूरे दिन के संघर्ष के बाद प्राप्त करता है। यह शाम हमें यह सबक देती है कि हर मुश्किल (Hardship) के बाद आसानी और इनाम (Reward) है। इफ्तार की बरकतें केवल दस्तरखान तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि वे इंसान के पूरे अस्तित्व को नूरानी (Radiant) बना देती हैं। इफ्तार का सही तरीका अपनाकर हम न केवल शारीरिक स्वास्थ्य (Physical Health) बल्कि रूहानी तरक्की भी हासिल कर सकते हैं।
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